{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Sukh Ka Dukh | Bhavani Prasad Mishra ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/9006975d\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":162,"description":"सुख का दुख / भवानीप्रसाद मिश्र\n\nज़िन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,\nइस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,\nक्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,\nबड़े सुख आ जाएँ घर में\nतो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूँ।\n\nयहाँ एक बात\nइससे भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,\nबड़े सुखों को देखकर\nमेरे बच्चे सहम जाते हैं,\nमैंने बड़ी कोशिश की है उन्हें\nसिखा दूँ कि सुख कोई डरने की चीज़ नहीं है।\n\nमगर नहीं\nमैंने देखा है कि जब कभी\nकोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते में\nबाज़ार में या किसी के घर,\nतो उनकी आँखों में ख़ुशी की झलक तो आई है,\nकिंतु साथ-साथ डर भी आ गया है।\n\nबल्कि कहना चाहिये\n ख़ुशी झलकी है, डर छा गया है,\nउनका उठना उनका बैठना\nकुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता,\nऔर मुझे इतना दु:ख होता है देख कर\nकि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता।\n\nमैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है,\nइससे डरो मत बल्कि बेफ़िक्री से बढ़ कर इसे छू लो।\nइस झूले के पेंग निराले हैं\nबेशक इस पर झूलो,\nमगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़ते\nखड़े खड़े ताकते हैं,\nअगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ।\n\nतो चीख मार कर भागते हैं,\nबड़े बड़े सुखों की इच्छा\nइसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है,\nकभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया था\nअब मैंने उन्हें फोड़ दी है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}