{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Auratein | Ramashankar Yadav Vidrohi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/91dcf99d\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":269,"description":"औरतें - रमाशंकर यादव विद्रोही\nकुछ औरतों ने \nअपनी इच्छा से \nकुएँ में कूदकर जान दी थी, \nऐसा पुलिस के रिकार्डों में दर्ज है। \nऔर कुछ औरतें \nचिता में जलकर मरी थीं, \nऐसा धर्म की किताबों में लिखा है। \nमैं कवि हूँ, \nकर्ता हूँ, \nक्या जल्दी है, \nमैं एक दिन पुलिस और पुरोहित, \nदोनों को एक ही साथ \nऔरतों की अदालत में तलब कर दूँगा, \nऔर बीच की सारी अदालतों को \nमंसूख कर दूँगा। \nमैं उन दावों को भी मंसूख कर दूँगा, \nजिन्हें श्रीमानों ने \nऔरतों और बच्चों के ख़िलाफ़ पेश किया है। \nमैं उन डिक्रियों को निरस्त कर दूँगा, \nजिन्हें लेकर फ़ौजें और तुलबा चलते हैं। \nमैं उन वसीयतों को ख़ारिज कर दूँगा, \nजिन्हें दुर्बल ने भुजबल के नाम की होंगी। \nमैं उन औरतों को \nजो कुएँ में कूदकर या चिता में जलकर मरी हैं, \nफिर से ज़िंदा करूँगा, \nऔर उनके बयानात को \nदुबारा क़लमबंद करूँगा, \nकि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया! \nकि कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया! \nकि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई! \nक्योंकि मैं उन औरतों के बारे में जानता हूँ \nजो अपने एक बित्ते के आँगन में \nअपनी सात बित्ते की देह को \nता-ज़िंदगी समोए रही और \nकभी भूलकर बाहर की तरफ़ झाँका भी नहीं। \nऔर जब वह बाहर निकली तो \nऔरत नहीं, उसकी लाश निकली। \nजो खुले में पसर गई है, \nमाँ मेदिनी की तरह। \nएक औरत की लाश धरती माता \nकी तरह होती है दोस्तो! \nजो खुले में फैल जाती है, \nथानों से लेकर अदालतों तक। \nमैं देख रहा हूँ कि \nजुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है। \nचंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित, \nऔर तमग़ों से लैस सीनों को फुलाए हुए सैनिक, \nमहाराज की जय बोल रहे हैं। \nवे महाराज जो मर चुके हैं, \nऔर महारानियाँ सती होने की तैयारियाँ कर रही हैं। \nऔर जब महारानियाँ नहीं रहेंगी, \nतो नौकरानियाँ क्या करेंगी? \nइसलिए वे भी तैयारियाँ कर रही हैं। \nमुझे महारानियों से ज़्यादा चिंता \nनौकरानियों की होती है, \nजिनके पति ज़िंदा हैं और \nबेचारे रो रहे हैं। \nकितना ख़राब लगता है एक औरत को \nअपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना, \nजबकि मर्दों को \nरोती हुई औरतों को मारना भी \nख़राब नहीं लगता। \nऔरतें रोती जाती हैं, \nमरद मारते जाते हैं। \nऔरतें और ज़ोर से रोती हैं, \nमरद और ज़ोर से मारते हैं। \nऔरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं, \nमरद इतने ज़ोर से मारते हैं कि \nवे मर जती हैं। \nइतिहास में वह पहली औरत कौन थी, \nजिसे सबसे...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}