{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Abhirupa | Anamika","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/93740f2a\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":178,"description":"अभिरूपा | अनामिका\nनहीं जानती मेरे जीवन का हासिल क्या\nमेरे वे सारे संबंध जो बन ही नहीं पाए\nवे मुलाकातें जो हुई ही नहीं\nवे रस्ते जो मुझसे छूट गए, या मैंने छोड़ दिये\nउड़ के दरवाज़े जो खोले नहीं मैंने\nशब्द जो उचारे नहीं और प्रस्ताव जो विचारे नहीं\nमेरे सगे थे वही जिनकी मैं सगी न हुई\nकरते हैं मेरी परिचर्या इस घने जंगल में वे ही\nजब आधी रात को फूलती है वह कुमुदनी\nमेरी हताहत शिराओं में और टूट जाती है नींद\nएक पक्षी चीखता है कहीं विरह दर्द \nआसमान भी किसी आहत जटायु सा\nबस गिरा ही चाहता है मेरे कंधों पर\nऔर उमड़ता है हृदय में सन्नाटा प्रलय मेघ सा\nभंते बताइए कैसे समझे कोई कौन सगा\nबुद्ध ने कहा जिसकी उपस्थिति चित्त की लौ को निष्कंप करे\nवही सगा अभिरूपा सदा वही जो तुमको \nमंथरगति से सीधा चलना सिखाए, बढ़ना सिखाए\nजो ऐसे, जैसे कि युद्धभूमि में हाथी बढ़ता है बौछार तीरों की हर तरफ से झेलता","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}