{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Aurat Ko Chahiye Thi | Adiba Khanum","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/94528317\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":180,"description":"औरत को चाहिए थी महज़ एक जेब। अदीबा ख़ानम\n\nऔरत को चाहिए थी महज़ एक जेब\nउसमें चन्द खनकते सिक्के\nजिनके के बल पर आज़ाद करने थे\nकुछ ऐसे पंछी\nजो पीढ़ी दर पीढ़ी\nकिसी महान षडयंत्र के तहत\nहोते आए थे क़ैद \nचाभियाँ पल्लू में बाँध\nनहीं भाता उन्हें रानियों का स्वाँग\nउन चाभियों ने बन्द कर रखे हैं\nकई क़ीमती संदूक\nजिनमें बन्द हैं\nख़ुद रानियाँ ही\nधूल फाँक रहीं गहनों की\nकिसी हीरे किसी मोती की चमक\nनहीं कर रही उनके जीवन में उजाला\nउजाले के लिए उन्हें\nनिकलना होगा इन क़ीमती  संदूकों से बाहर\nरगड़ने होंगे तलवे जलती मिट्टी पर\nक्योंकि\nइस रगड़ से ही बनते हैं\nरोशन सिक्के\nजिनकी चमक से बदल जाता हैं\nउस आदमी का लहज़ा जो कहता है\nकि घर में पड़ी औरत मुफ़्त तोड़ती है रोटियाँ\nदरअसल तुमने थमा दी औरत को चाभियाँ\nबना दिया उन्हें रानीयां\nकेवल इसलिए\nकि तुम्हें\nऔरत के पैर की रगड़ से निकले\nसिक्कों से डर लगता है\nकि तुम्हें औरत की जेब से डर लगता है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}