{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Isliye To Tum Pahad Ho | Rajesh Joshi ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/94d764f1\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":302,"description":"इसीलिए तो तुम पहाड़ हो | राजेश जोशी \n\nशिवालिक की पहाड़ियों पर चढ़ते हुए हाँफ जाता हूँ \nसाँस के सन्तुलित होने तक पौड़ियों पर कई-कई बार रुकता हूँ\nआने को तो मैं भी आया हूँ यहाँ एक पहाड़ी गाँव से\nविंध्याचल की पहाड़ियों से घिरा है जो चारों ओर से\nमेरा बचपन भी गुज़रा है पहाड़ियों को धाँगते\nअवान्तर दिशाओं की पसलियों को टटोलते और\nपहाड़ी के छोर से उगती यज्ञ-अश्व की खोपड़ी\nजैसी उषाएँ देखते हुए\nसब कहते हैं विंध्याचल एक झुका हुआ पहाड़ है\nअगस्त्य को दक्षिण का रास्ता देने के लिए वो झुक गया था\nऔर सदियों से उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है\nमैंने कितनी बार विंध्याचल के कान में जाकर फुसफसाकर कहा\nचिल्ला-चिल्लाकर, गला फाड़कर कहा\nकि ऋषियों की बातों पर भरोसा करना बन्द कर\nऋषि अपने स्वयं के झूठ से नहीं डरते\nवो सिर्फ़ दूसरों को झूठ से डरना सिखाते हैं।\nपौड़ियाँ चढ़ते हाँफ जाता हूँ \nपर शिवालिक की चढ़ाइयाँ हैं\nकि कहीं ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेतीं\nमेरी हिम्मत जहाँ जवाब दे जाती है\nवहाँ से ही कोई अगली चढ़ाई शुरू हो जाती है\nसाथ चलता दोस्त कहता है कि अगस्त्य यहीं आए थे\nऔर इन पहाड़ों से वापस कभी नहीं लौटे\nमैं कहता हूँ मुझे कोई मतलब नहीं कि अगस्त्य दक्षिण गए थे\nया आए थे शिवालिक की पहाड़ियों में\nमैं कोई ऋषि नहीं, एक साधारण-सा कवि हूँ\nजो दिन-रात की जद्दोजहद के गीत लिखता है\nमैं वापस लौटकर जाऊँगा\nलौटकर जाऊँगा ज़रूर \nऔर एक बार फिर विंध्याचल को बताने की कोशिश करूँगा\nकि अगस्त्य के लौटने की प्रतीक्षा फ़िज़ूल है\nतुम अब अपनी कमर सीधी कर लो\nऔर अपने पूरे क़द के साथ खड़े हो जाओ तनकर\nमैं तब भी तुम्हारे मज़बूत कंधों पर बैठकर\nदूर तक फैले जीवन के रंग-बिरंगे मेले देखूँगा\nहिमालय से ज़्यादा है तुम्हारी आयु जानता हूँ\nऔर ज़्यादा मज़बूत हैं तुम्हारे कंधे\nज्वालामुखी के बहते हुए लावे के अचानक\nरुककर ठहर जाने की छवियाँ हैं तुम्हारी चट्टानों में\nतुम्हारी गुफाओं में सुरक्षित हैं हमारे पूर्वजों की उकेरी हुई\nशिकार खेलने और आग जलाने की छवियाँ\nमुझे तुम हमेशा अच्छे लगते हो\nमेरी आत्मा की चील ने तो बना लिया है\nतुम्हारी चट्टान पर अपना स्थायी घोंसला\nतुम्हीं ने सिखाया है मुझे कि झुक जाना\nछोटा हो जाना नहीं है\nजानता हूँ किसी ज़रूरतमन्द को रास्ता देने को\nतुम झुक गए\nइसीलिए तो तुम पहाड़ हो!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}