{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Mit Gaye Maidanon Wala Gaon | Gyanendrapati","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/95f63769\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":302,"description":"मिट गये मैदानोंवाला गाँव - ज्ञानेन्द्रपति\nमिट गये मैदानों वाला गाँव\nक़स्बे की पान-रँगी मुस्कान मुस्काता जै राम जी की कहता है\nडूबती तरैयाँ और डूबती बिरियाँ निकलता था जो दिशा-मैदान के लिए\nऔर अब जिसकी किसी भी दिशा में मैदान नहीं\nगाँव ने मैदान मार लिया है।\nशहर बनने की राह में\nअपना मैदान मार दिया है\nचौराहे की गुमटियों में \nमटियाली बीड़ियों के मुट्ठे\nसफ़ेद सिगरेटों के रंगीन पैकिटों में बदल गये हैं\nसड़क के दोनों तरफ \nप्रायः पक्के मकान\nशेष जो हैं वे भी कच्चे नहीं, अधपके हैं\nबचपन के दोस्त\nअसमय अधेड़\nसुखी सफल गंजे\nउनकी आँखों में झाँकता हूँ\nआँखों उठाता हूँ उनके मन का बन्द शटर\nगाँव का मिट गया मैदान वहाँ मिल जाये अँजुरी-भर जल-सा\nबचपन के गाँव का ही नहीं, गाँव के बचपन का मैदान\nगेंद के केन्द्रबिन्दु वाला\nजो पहली बार छिना\nजब खुला वहाँ ब्लॉक-ऑफिस \nबने कर्मचारियों के आवास\nकोने में जहाँ एक पाकड़ था पुराना, वहीं ट्रेजरी\nकिसी ट्रैजिडी के पहले दृश्य-सा-उत्सव की गहमागहमीवाला\nसिरहाने का मैदान गँवाकर \nताका गोड़तारी गाँव ने\nनीचे, दूर\nवह जो डँगाल था\nअधरात जिसे पंजों खूंदते फेकरते थे सियार\nआते थे जब गाँव के कुत्तों को कोसने जुड़ते थे जहाँ हम बस बरस में एक बार\nगाँव-भर की होलिका जलाने\nलिये हरियर चने का मुट्ठा, भूँजने को अपना होरहा \nचरवाहे बच्चों की गुहारें ही जब-तब जिसका आकाश पक्षियों के साथ करती थीं पार\nखुला फैला वह ढलवाँ डँगाल\nबना हमारा मैदान\nसंझा का\nजब हमारी उछलती गेंद से नीचे होता था सूरज\nढलते सूरज को भी जब हम गेंद की तरह उछाल देना चाहते थे ऊपर हमारी गेंद को गुम कर, गाँव की लालटेनों को \nसाँवली उँगलियों जलानेवाली गोधूलि को \nउतरने न देना चाहते थे \nकिताब के और रात के पन्नों को खोलने\nछिन गया वह मैदान भी कब का \nकस्बे की आहटों और कसमसाहटों ने\nएकाएक नहीं, धीरे-धीरे\nभरा उसका धरती आकाश\nऔर अब\nयहाँ के बच्चों के लिए\nमैदान बचा है\nटेलीविज़न के पर्दे-भर\nबस उनके नेत्रगोलकों-भर\nमिट गये मैदानोंवाला यह गाँव\nनगर में भी तो\nरूमाल-भर पार्कों और गोलाम्बरों और खेलनिया न भी तो घुमनिया मैदानोंवाले \nनगर में भी तो\nनहीं बदलेगा कभी\nअधिक-से-अधिक विकसेगा वैसे कस्बे में\nजहाँ गली-गली खुलनेवाले \nमैदानहीन स्कूलों के आँगन में\nखौलते जल की तरह खलबलाते हैं बच्चे\nखेल की घण्टी में\nबस रविवार की सड़कों पर \nबनती उनकी पिच\nरह-रह पहियों...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}