{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ma | Mamta Kalia","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/962fdc02\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":146,"description":"\nमाँ - ममता कालिया \n\nपुराने तख़्त पर यों बैठती हैं\nजैसे वह हो सिंहासन बत्तीसी।\nहम सब\nउनके सामने नीची चौकियों पर टिक जाते हैं\nया खड़े रहते हैं अक्सर।\nमाँ का कमरा\nउनका साम्राज्य है।\nउन्हें पता है यहाँ कहाँ सौंफ की डिबिया है और कहाँ ग्रन्थ साहब\nकमरे में कोई चौकीदार नहीं है\nपर यहाँ कुछ भी\nबगैर इजाज़त छूना मना है।\nमाँ जब ख़ुश होती हैं\nमर्तबान से निकालकर थोड़े से मखाने दे देती हैं मुट्ठी में।\nहम उनके कमरे में जाते हैं\nस्लीपर उतार।\nउनकी निश्छल हँसी में\nतमाम दिन की गर्द-धूल छँट जाती है।\nएक समाचार हम  उन्हें सुनाते हैं अख़बार से,\nएक समाचार वे हमें सुनाती हैं\nअपने मुँह ज़ुबानी अख़बार से।\nउनके अख़बार में है\nहमारा परिवार, पड़ोस, मुहल्ला और मुहाने की सड़क।\nअक्सर उनके समाचार\nहमारी ख़बरों से ज़्यादा सार्थक होते हैं।\nउनकी सूचनाएँ ज़्यादा सही और खरी।\nवे हर बात का\nएक मुकम्मल हल ढूँढना चाहती हैं।\nबहुत जल्द उन्हें\nहमारी ख़बरें बासी और बेमज़ा लगती हैं।\nवे हैरान हैं\nकि इतना पढ़-लिखकर भी\nहम किस क़दर मूर्ख हैं\nकि दुनिया बदलने का दम भरते हैं\nजबकि तकियों के ग़िलाफ़ हमसे बदले नहीं जाते!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}