{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Amrapali - Anamika","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/9a81547e\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":365,"description":"आम्रपाली - अनामिका\nथा आम्रपाली का घर\nमेरी ननिहाल के उत्तर !\nआज भी हर पूनो की रात\nखाली कटोरा लिए हाथ\nगुज़रती है वैशाली के खण्डहरों से\nबौद्धभिक्षुणी आम्रपाली ।\nअगल-बगल नहीं देखती,\nचलती है सीधी मानो ख़ुद से बातें करती\nशरदकाल में जैसे\n(कमण्डल-वमण्डल बनाने की ख़ातिर)\nपकने को छोड़ दी जाती है\nलतर में ही लौकी\nपक रही है मेरी हर मांसपेशी,\nखदर-बदर है मेरे भीतर का\nहहाता हुआ सत !\nसूखती-टटाती हुई\nहड्डियाँ मेरी\nमरे कबूतर-जैसी\nइधर-उधर फेंकी हुई मुझमें\nसोचती हूँ क्या वो मैं ही थी\nनगरवधू-बज्जिसँघ के बाहर के लोग भी जिसकी\nएक झलक को तरसते थे ?\nये मेरे सन-से सफ़ेद बाल\nथे कभी भौंरे के रँग के कहते हैं लोग,\nनीलमणि थीं मेरी आँखें\nबेले के फूलों-सी झक सफ़ेद दन्तपँक्ति :\nखण्डहर का अर्द्धध्वस्त दरवाज़ा हैं अब जो !\nजीवन मेरा बदला, बुद्ध मिले,\nबुद्ध को घर न्योतकर\nअपने रथ से जब मैं लौट रही थी\nकुछ तरुण लिच्छवी कुमारों के रथ से\nटकरा गया मेरे रथ का\nधुर से धुर, चक्के से चक्का, जुए से जुआ !\nलिच्छवी कुमारों को ये अच्छा कैसे लगता,\nबोले वे चीख़कर —\n“जे आम्रपाली, क्यों तरुण लिच्छवी कुमारों के धुर से\nधुर अपना टकराती है ?”\n“आर्यपुत्रो, क्योंकि भिक्खुसंघ के साथ\nभगवान बुद्ध ने भात के लिए मेरा निमन्त्रण किया है स्वीकार !”\n“जे आम्रपाली !\nसौ हजार ले और इस भात का निमन्त्रण हमें दे !”\n“आयपुत्रो, यदि तुम पूरा वैशाली गणराज्य भी दोगे,\nमैं यह महान भात तुम्हें नहीं देने वाली !”\nमेरा यह उत्तर सुन वे लिच्छवी कुमार\nचटकाने लगे उँगलियाँ :\n‘हाय, हम आम्रपाली से परास्त हुए तो अब चलो,\nबुद्ध को जीतें !’\nकोटिग्राम पहुँचे, की बुद्ध की प्रदक्षिणा,\nउन्हें घर न्योता,\nपर बुद्ध ने मान मेरा ही रखा\nऔर कहा ‘रह जाएगी करुणा, रह जाएगी मैत्री,\nबाक़ी सब ठह जाएगा...’\n“तो बहा काल-नद में मेरा वैभव...\nराख की इच्छामती,\nराख की गँगा,\nराख की कृष्णा-कावेरी,\nगरम राख़ की ढेरी\nयह काया\nबहती रही\nसदियों\nइस तट से उस तट तक !\nटिमकता रहा एक अँगारा,\nतिरता रहा राख़ की इस नदी पर\nबना-ठना\nठना-बना\nतैरा लगातार !\nतैरी सोने की तरी !\nराख़ की इच्छामती !\nराख़ की गंगा !\nराख़ की कृष्णा-कावेरी ।\nझुर्रियों की पोटली में\nबीज थोड़े-से सुरक्षित हैं\nवो ही मैं डालती जाती हूँ\nअब इधर-उधर !\nगिर जाते हैं थोड़े-से बीज पत्थर पर,\nचिड़िया का चुग्गा बन जाते हैं वे,\nबाक़ी खिल जाते हैं...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}