{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Itne Bhale Nahi Ban Jana | Viren Dangwal | Varun Grover","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/9b6d34b8\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":167,"description":"इतने भले नहीं बन जाना साथी - वीरेन डंगवाल\nइतने भले नहीं बन जाना साथी \nजितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी \nगदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कूवत सारी प्रतिभा \nकिसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया \nऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया? \nइतने दुर्गम मत बन जाना \nसंभव ही रह जाए न तुम तक कोई राह बनाना \nअपने ऊँचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए \nलेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना \nइतने चालू मत हो जाना \nसुन-सुन कर हरकतें तुम्हारी पड़े हमें शरमाना \nबग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफ़साना \nऐसे घाघ नहीं हो जाना \nऐसे कठमुल्ले मत बनना \nबात नहीं जो मन की तो बस तन जाना \nदुनिया देख चुके हो यारो \nएक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो \nपोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव \nकठमुल्लापन छोड़ो, उस पर भी तो तनिक विचारो \nकाफ़ी बुरा समय है साथी \nगरज रहे हैं घन घमंड के नभ की फटती है छाती \nअंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन \nजिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती \nसंस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती \nइनकी असल समझना साथी \nअपनी समझ बदलना साथी","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}