{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Harmonium Ki Dukaan Se | Kumar Ambuj","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/9b908eb9\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":183,"description":"हारमोनियम की दुकान से । कुमार अम्बुजउस पुरानी-सी दुकान पर ग्राहक कोई नहीं थाबस एक बूढ़ा आदमी चुपचाप झुका हुआ एक हारमोनियम परइतना तन्मय और बाकी चीज़ों से इतना बेखबरकि जैसे वह उस हारमोनियम का ही कोई हिस्सावह बार-बार दबा रहा था एक रीड कोशायद उसकी स्प्रंग ठीक नहीं थीधम्मन चलाते हुए उसने कई बार उस रीड को दबायाएक हलका-सा सुर गूँजता था उस भीड़ भरे बाज़ार मेंजो दस क़दम की दूरी तय करते-करते तोड़ देता था दमगज़ब कोलाहल के बीच एक मद्धिम सुर को साध रहा था वह बूढ़ावह चिंतित था कि ठीक तरह से निकले वह सुरवह इस तरह से सुनता था उस मद्धिम सुर कोजैसे इस समय की एक सबसे ज़रूरी आवाज़मुझे याद अ रहे थे वे सारे गीत जिनमें बजता रहा हारमोनियमऔर बचपन की भजन संध्याएँजिनमें हारमोनियम बजाते थे ताऊ तो रुक जाता था पूर्णमासी का चाँदअचानक खुश हुआ वह बूढ़ाऔर तनिक सीधे होते हए धम्मन चलाकरउसने दबाई वही रीड जिसे  सुधार रहा था वह बहुत देर से","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}