{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Sach Choocha Hota Hai | Amitava Kumar","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/9bbb6dc5\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":140,"description":"सच छूछा होता है।- अमिताव कुमार\n \nमहात्मा गाँधी की आत्मकथा में\nमौसम का कहीं ज़िक्र नहीं,\nलंदन की किसी ईमारत या\nसड़क के बारे में कोई बयान नहीं,\nकिसी कमरे की, कभी एकत्रित भीड़ या\nयातायात के किसी साधन की कहीं कोई\nचर्चा नहीं–\nयह वी. एस. नायपॉल की आलोचना है।\nलेकिन मौसम तो गांधीजी के अंदर था!\nतूफान से जूझती एक अडिग आत्मा–\nनैतिकता की पतली पगडण्डी पर ठोकर खाता,\nसंभलता, रास्ता बनाता बढ़ता हुआ इन्सान!\nअगर आप सच की खोज कर रहे हैं,\nक्या फर्क पड़ता है कि\nसूरज आज शाम 6:15 पे डूबा कि 6:25 पे?\nलेकिन नायपॉल की बात सर-आँखों पर!\nअगर आप महात्मा नहीं\nमहज लेखक हैं,\nआपको ध्यान देना होगा\nनोट करना होगा,\nअपने आसपास की दीवारों पर\nखरोंचे गए प्रेमियों के नाम\nछतों पर गिरती बारिश की बूंदों का अंतराल आंधी में झूमते पेड़ों की डालों का लचीलापन\nसाइकिल की घंटी की आवाज़\nया फिर दंगे के बाद का सन्नाटा\nलिखना होगा,\nकैंटीन में चुपचाप बैठी युवती के बारे में\nजिसके सामने रखे पानी के गिलास में\nपूरी दुनिया उलटी दिखाई देती है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}