{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ghar Ki Ore | Naresh Mehta","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/9c366d6d\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":158,"description":"घर की ओर | नरेश मेहता \n\nवह-\nजिसकी पीठ हमारी ओर है\nअपने घर की ओर मुँह किये जा रहा है\nजाने दो उसे\nअपने घर।\nहमारी ओर उसकी पीठ-\nठीक ही तो है\nमुँह यदि होता\nतो भी, हमारे लिए वह\nसिवाय एक अनाम व्यक्ति के\nऔर हो ही क्या सकता था?\nपर अपने घर-परिवार के लिए तो\nवह केवल मुँह नहीं\nएक सम्भावनाओं वाली\nऐसी संज्ञा\nजिसके साथ सम्बन्धों का इतिहास होगा\nऔर होगी प्रतीक्षा करती\nराग की\nएक सम्पूर्ण भागवत-कथा।\nतभी तो\nवह-\nहाथ में तेल की शीशी,\nकन्धे की चादर में\nबच्चों के लिए चुरमुरा\nगुड़ या मिठाई\nया अपनी मुनिया के लिए होगा\nकोई खिलौना\nऔर निश्चित ही होगी\nबच्चों की माँ के लिए भी...\n(जाने दो\nउसकी इस व्यक्तिगत गोपनीयता की गाँठ\nहमें नही खोलनी चाहिए।)\nवह जिस उत्सुकता और तेज़ी से\nचल रहा है\nतुम्हें नहीं लगता कि\nएक दिन में\nवह पूरी पृथ्वी नाप सकता है\nसूर्य की तरह?\nबशर्ते उस सिरे पर\nसूर्य की ही तरह\nउसका भी घर हो\nबच्चे हों और\nइसलिए घर जाते हुए व्यक्ति में\nऔर सूर्य में\nकाफी कुछ समानता है।\nपुकारो नहीं-\nउसे जाने दो\nहमारी ओर पीठ होगी\nतभी न घर की ओर उसका मुँह होगा!\nसूर्य को पुकारा नहीं जाता\nउसे जाने दिया जाता है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}