{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Nadi Ka Smarak | Kedarnath Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/9f6ad3c7\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":196,"description":" नदी का स्मारक | केदारनाथ सिंह\n\nअब वह सूखी नदी का\nएक सूखा स्मारक है।\nकाठ का एक जर्जर पुराना ढाँचा\nजिसे अब भी वहाँ लोग\nकहते हैं 'नाव'\nजानता हूँ लोगों पर उसके\nढेरों उपकार हैं\nपर जानता यह भी हूँ कि उस ढाँचे ने\nबरसों से पड़े-पड़े\nखो दी है अपनी ज़रूरत\nइसलिए सोचा\nअबकी जाऊँगा तो कहूँगा उनसे-\nभाई लोगों, \nकाहे का मोह\nआख़िर काठ का पुराना ढाँचा ही तो है\nसामने पड़ा एक ईंधन का ढेर-\nजिसका इतना टोटा है!\nवैसे भी दुनिया\nनाव से बहुत आगे निकल गई है\nइसलिए चीर-फाड़कर\nउसे झोंक दो चूल्हे में\nयदि नहीं\nतो फिर एक तखत या स्टूल ही बना डालो उसका\nइस तरह मृत नाव को\nमिल जाएगा फिर से एक नया जीवन\nपर पूरे जतन से\nउन शब्दों को सहेजकर\nजब पहुँचा उनके पास\nउन आँखों के आगे भूल गया वह सब\nजो गया था सोचकर\n'दुनिया नाव से आगे निकल गई है'-\nयह कहने का साहस\nहो गया तार-तार\nवे आँखें\nइस तरह खली थीं\nमानो कहती हों-\nकाठ का एक जर्जर ढाँचा ही सही\nपर रहने दो 'नाव' को\nअगर वह वहाँ है तो एक न एक दिन\nलौट आएगी नदी\nजानता हूँ\nवह लौटकर नहीं आएगी\nआएगी तो वह एक और नदी होगी\nजो मुड़ जाएगी कहीं और\nसो, चलने से पहले\nमैंने उस जर्जर ढाँचे को\nसिर झुकाया \nऔर जैसे कोई यात्री पार उतरकर\nजाता है घर\nचुपचाप लौट आया।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}