{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Naye Tarah Se | Shashwat Upadhyay","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/a30ed500\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":157,"description":"नए तरह से लैस होकर आ गई है नई सदी | शाश्वत उपाध्याय \n\nजो दिख नहीं रही मनिहारिन,\nउसके चूड़ियों का बाज़ार\nबेड़ियों के भेंट चढ़ गया है।\nमोतियों की दुकान से\nसीपियों ने रार ठान लिया है\nनई तरह की लड़ाई लेकर आई है नई सदी।\n\nटिकुली साटती-दोपहर काटती\nसारी औरतें\nशिव चर्चाओं में गूंथ दी गईं हैं।\nशिव के गीतों में,\nअब छपरा-सिवान के सज्जन का ज़िक्र भी होने लगा है\nनई तरह की आस्था भी लेकर आ गई है नई सदी।\n\nखेत, भूरे होकर अलसा गए हैं\nहवा के सहारे गोते लगाते गेहूँ\nडर कर चीख देते हैं सरेआम।\nकिसानी के नाम चढ़े चैत में खेत नहीं, समय काट रही बनिहारन।\n\n'आग लागो- बढ़नी बहारो, हेतना घाम'\nबोलने वाली गाँव भर की ठेकेदारन\nनेपाल से आँख बनवा कर लौटी तो ज़रूर\nलेकिन खेत में नहीं डाले पाँव उसने\n\nमोतियाबिंद ने आंख का पानी जगा दिया।\nकि नई बिमारी भी लेकर आ गई नई सदी।\n\nचहक कर पेड़ के गोदी में झूल जाने वाले बच्चे,\nसमय से पहले बड़े हो गए ऐसा भी नहीं है\nजीवन जीने को साधने के लिए सूरत से दमन तक बिछ गए हैं ज़रूर।\nभय यही है\nकि\nरोटी-कपड़ा-मकान देने के लिए\nशराब में खप कर अगर बचेंगे\nतो अंत में धर्म के नाम पर चीख देंगे सरेआम\nजैसे पके हुए गेहूँ हों।\nऔर चीख तो एक जैसी होती है\nक्या गेहूँ-क्या इंसान\n\nभले ही नई तरह से लैस होकर आई है नई सदी,\nनई तरह की चीख लेकर नहीं आ सकी।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}