{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Shakkar Si Yaad | Suryabala","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/a312ec91\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":233,"description":"शक्कर सी याद -  सूर्यबाला\n \nधुली-धुली शक्कर सी याद-\nतन-मन में रच रही मिठास।\nआओ सब, बैठो मेरे पास\nसुनो कहानी....\nन राजा, न रानी....\nन मोती, न माणिक\nबस एक अधफूटे जीने\nऔर उखड़े पलस्तर वाले घर की-\nअधफूटी मुंडेरों से \nसर्र-सर्र उड़ती पतंगों की-फर-फर पतंगें, \nजैसी मेरी पंचरंग चुनर....\nमां ने रंगवाई, जतन से पहनाई।\nहल्दी-दूब, धान-पान\nकुमकुम से भरी मांग \nकैसी तो जगर-मगर\nटोने-टोटके और काजल के टीके से सँवर-\nदेख लो, \nतब से अब तक\nजस की तस....\nदेहरी से पनघट\nऔर खेत खलिहान तक\nमिठबोलियों की लहलहाती फसल....\nक्या कहते हो राहगीर?\nकहाँ चलते हैं छुरे-गंडासे?\nकहाँ फूटते हैं बम!!\nकिस देस? किस नगर? किस डगर?\nवह न होगा हमारा घर, हमारा शहर-\nहमारे पास तो सिर्फ मुट्ठी भर अबीर\nअनार, फुलझड़ियाँ, बस!\nलेकिन रुको!\nतुम जाना क्यों चाहते हो उस देस? उस डगर?\nमेरी मानो, मत जाओ....\nरुक जाओ-\nयहीं हमारे घर.......\nनहीं, छोटा नहीं पड़ेगा यह\nक्योंकि आज तक कभी पड़ा ही नहीं।\nकभी कोई उदास लौटा नहीं-\nऐसा है यह घर, ये नगर, ये दर-\nखाने पीने को भी इफरात है-\nमक्की जई, गुड़ अचार\nलइया चना दही भात-\nअजीब देश है भइया यह\nयहां खुशियां पतंगों की तरह\nदस बीस पैसों में खरीदी जाती हैं-\nऔर छरहरे आसमान में-\nजीभर कर उड़ाई जाती हैं-\nऔर तो और- \nदो-चार कट भी गईं तो-\nलूट-लूट कर दुछत्ती में रख ली जाती हैं।\nखुशियाँ...खुशियाँ...खुशियाँ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}