{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Prithvi Ka Mangal Ho | Ashok Vajpeyi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/a4d3775c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":194,"description":"पृथ्वी का मंगल हो | अशोक वाजपेयी\nसुबह की ठंडी हवा में \nअपनी असंख्य हरी रंगतों में \nचमक-काँप रही हैं \nअनार-नींबू-नीम-सप्रपर्णी-शिरीष-बोगेनबेलिया-जवाकुसुम-सहजन की पत्तियाँ : \nधूप उनकी हरीतिमा पर निश्छल फिसल रही है : \nमैं सुनता हूँ उनकी समवेत प्रार्थना : \nपृथ्वी का मंगल हो! \n\nएक हरा वृंदगान है विलम्बित वसंत के उकसाए \nजिसमें तरह-तरह के नामहीन फूल \nस्वरों की तरह कोमल आघात कर रहे हैं : \nसब गा-गुनगुना-बजा रहे हैं \nस्वस्तिवाचन पृथ्वी के लिए। \n\nसाइकिल पर एक लड़की लगातार चक्कर लगा रही है \nखिड़कियाँ-बालकनियाँ खुली हैं पर निर्जन \nएकांत एक नए निरभ्र नभ की तरह \nसब पर छाया हुआ है \nपर धीरे-धीरे बहुत धीमे बहुत धीरे \nएकांत भी गा रहा है पृथ्वी के लिए मंगलगान। \n\nघरों पर, दरवाज़ों पर \nकोई दस्तक नहीं देता— \nपड़ोस में कोई किसी को नहीं पुकारता \nअथाह मौन में सिर्फ़ हवा की तरह अदृश्य \nहल्के से धकियाता है हर दरवाज़े, हर खिड़की को \nमंगल आघात पृथ्वी का। \nइस समय यकायक बहुत सारी जगह है \nखुली और ख़ाली \nपर जगह नहीं है संग-साथ की, मेल-जोल की, \nबहस और शोर की, पर फिर भी \nजगह है : शब्द की, कविता की, मंगलवाचन की। \n\nहम इन्हीं शब्दों में, कविता के सूने गलियारे से \nपुकार रहे हैं, गा रहे हैं, \nसिसक रहे हैं \nपृथ्वी का मंगल हो, पृथ्वी पर मंगल हो। \n\nपृथ्वी ही दे सकती है \nहमें \nमंगल और अभय \nसारे प्राचीन आलोकों को संपुंजित कर \nनई वत्‍सल उज्ज्वलता \nहम पृथ्वी के आगे प्रणत हैं। ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}