{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ae Aurat | Nasira Sharma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/a5294159\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":156,"description":"ऐ औरत! | नासिरा शर्मा \n\nजाड़े की इस बदली भरी शाम को\nकहाँ जा रही हो पीठ दिखाते हुए\nठहरो  तो ज़रा!\nमुखड़ा तो देखूँ कि उस पर कितनी सिलवटें हैं\nथकन और भूख-प्यास की\nसर पर उठाए यह सूखी लकड़ियों का गट्ठर\n कहाँ लेकर जा रही हो  इसे?\nतुम्हें नहीं पता है कि लकड़ी जलाना, धुआँ फैलाना, वायु को दूषित करना\nअपराध है अपराध!\n \nगैस है, तेल है ,क्यों नहीं करतीं इस्तेमाल उसे\nतुम्हारी ग़रीबी, बेचारगी और बेकारी के दुखड़ों से\nकुछ नहीं लेना देना है क़ानून को\nबस इतना कहना है कि\nजाड़े की ठिठुरी रात में,गरमाई लेते हुए\nरोटी सेंकने की ग़लती मत कर बैठना\nपेड़ कुछ कहें या न कहें  तुम्हें मगर\nइस अपराध पर, क़ानून पकड़ लेगा तुम्हें\n\nयह दो हज़ार चौबीस है\nबदलते समय के साथ चलो ,\nऔर पुराने रिश्तों से नाता तोड़ो\nसवाल मत करो कि बमों से निकलते बारूद\nधूल, धुएँ से पर्यावरण का नाश नहीं होता\nपेड़ों के कटने से गर्मी का क़हर नहीं टूटता\nयह छोटे मुँह और बड़ी बात होगी।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}