{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Main Jungle Se Guzarta Hun To Lagta Hai | Gulzar","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/a55f7dc0\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":141,"description":"मैं जंगल से गुज़रता हूँ तो लगता है मेरे पुरखे खड़े हैं! | गुलज़ारमैं जंगल से गुज़रता हूँ तो लगता है मेरे पुरखे खड़े हैंमैं इक नौ ज़ाइदा बच्चाये पेड़ों के क़बीलेउठा के हाथ में मुझ को झुलाते हैंकोई इक झुनझुना फूलों का हाथों से बजाता है कोई आँखों पे पुचकाता है खुशबुओं की पिचकारी बहुत बूढ़ा-सा दढ़ियल एक बरगद गोद में लेकर मुझे हैरानहोता है, सुनाता हैतुम अब चलने लगे हो!हमारे जैसे थे तुम भी, जड़ें मिट्टी में रहती थीं बड़ी ताक़त लगाते थे तुम अपने बीज में सूरज पकड़ने की ज़मीं पर आए थे पहलेतुम्हें फिर रेंगते देखा...हमारी शाख़ों पर चढ़ते थे, चढ़ के कूद जाते थे,फुदकते थेमगर दो पाँव पर जब तुम खड़े होकर के दौड़े, फिर नहीं लौटे पहाड़ों पत्थरों के हो गए तुम! मगर फिर भी... तुम्हारे तन में पानी है तुम्हारे तन में मिट्टी हैहमीं से हो…हमीं में फिर से बोए जाओगे, तुम फिर से लौटोगे!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}