{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Pita Ke Ghar Me | Rupam Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/a7c37149\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":233,"description":"पिता के घर में | रूपम मिश्रा\n\nपिता क्या मैं तुम्हें याद हूँ!\nमुझे तो तुम याद रहते हो\nक्योंकि ये हमेशा मुझे याद कराया गया\nफासीवाद मुझे कभी किताब से नहीं समझना पड़ा\nपिता के लिए बेटियाँ शरद में\nदेवभूमि से आई प्रवासी चिड़िया थीं\nया बँसवारी वाले खेत में उग आई रंग-बिरंगी मौसमी घास\nपिता क्या मैं तुम्हें याद हूँ!\nशुकुल की बेटी हो!\nये आखर मेरे साथ चलता रहा\nजब सबको याद रहा कि मैं तुम्हारी बेटी हूँ तो तुम्हें क्यों नहीं याद रहा\nमाँ को मैं हमेशा याद रही\nबल्कि बहत ज़्यादा याद रही\nपर पिता को!\nकभी पिता के घर मेरा जाना होता\nमाँ बहुत मनुहार से कहती\nपिता से मिलने दालान तक नहीं गई\nजा! चली जा बिटिया, तुम्हें पूछ रहे थे\nकह रहे थे कि कब आई! मैंने उसे देखा नहीं!\nमैं बेमन ही भतीजी के संग बैठक तक जाती हूँ\nपिता देखते ही गदगद होकर कहते हैं।\nअरे कब आई! खड़ी क्यों हो आकर बैठ जाओ\nमैं संकोच से झुकी खड़ी ही रहती हूँ\nपिता पूछते हैं मास्टर साहब (ससुर) कैसे हैं?\nमैं कहती हूँ ठीक हैं!\nअच्छा घर में इस समय गाय- भैंस का लगान तो है ना!\nबेटवा नहीं आया?\nमैं कहती हूँ नहीं आया\nदेखो अबकी चना और सरसों ठीक नहीं है\nब्लॉक से इंचार्ज साहब ने बीज ही गलत भिजवाया\nपंचायत का कोई काम ठीक नहीं चल रहा है।\nये नया ग्रामसेवक अच्छा नहीं है\nअब मुझसे वहाँ खड़ा नहीं हुआ जाता\nमैं धीरे से चलकर चिर-परिचित गेंदे के फूलों के पास आकर खड़ी हो जाती हूँ\nपिता अचानक कहते हैं अरे वहाँ क्यों खड़ी हो वहाँ तो धूप है!\nमैं चुप रहती हूँ\nमाँ कहती हैं अभी मॅँह लाल हो जाएगा\nपिता गर्वमिश्रित प्रसन्नता से कहते हैं\nऔर क्या धूप और भूख ये कहाँ सह पाती है\nमेरी आँखें रंज से बरबस भर आती हैं।\nमैं चीख कर पूछना चाहती हूँ\nये तुम्हें पता था पिता!\nपर चुप रहकर खेतों की ओर देखने लगती हूँ\nपिता के खेत-बाग सब लहलहा रहे हैं\nबूढ़ी बुआ कहती थीं\nदैय्या! इत्ती बिटिया!\nगाय का चरा वन और बेटी का चरा घर फिर पेनपै तब जाना।\nबुआ तुम कहाँ हो! देख लो!\nहमने नहीं चरा तुम्हारे भाई-भतीजों का घर\nसब खूब जगमग है\nइतना उजाला कि ध्यान से देखने पर आँखों में पानी आ जाए।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}