{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Mujh Se Pehle | Ahmad Faraz","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/abcc1108\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":151,"description":"मुझ से पहले। अहमद फ़राज़मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस नेशायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा होएक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायदअपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा होजज़ीरा: द्वीपमैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ाबेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा: जो प्रेम का वादा करके भूल गया होखो चुका है जो किसी और की रानाई मेंशायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल मेंऔर कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई मेंमैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों मेंवक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ताचाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ताशब-ओ-रोज़: रात-दिन; मुस्तक़िल: निरंतर; बोद : दूरीफिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहेमुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतींज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता हैदूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतींमाज़ी: अतीतये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशेमाँ हो करतेरे पास आए ज़माने से किनारा कर लेतू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी हैउस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर लेपशेमाँ: शर्मिंदा; ज़ूद-फ़रामोश: जल्दी भूलने वाला; ज़ूद-फ़रामोश: वादा तोड़नाऔर मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझाएक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँजिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैंइसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँअहद-ए-वफ़ा: प्रेम में दिया गया वचन","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}