{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Bhutha Baag | Kedarnath Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/adee6886\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":179,"description":"भुतहा बाग़ | केदारनाथ सिंह \n\nउधर जाते हुए बचपन में डर लगता था\nराही अक्सर बदल देते थे रास्ता\nऔर उत्तर के बजाय\nनिकल जाते थे दक्खिन से\n अबकी गया तो देखा\nभुतहा बाग़ में खेल रहे थे बच्चे\nवहाँ बन गए थे कच्चे कुछ पक्के मकान\nदिखते थे दूर से कुछ बिजली के खंभे भी \nलोगों ने बताया\nजिस दिन गाड़ा गया पहला खम्भा\nएक आवाज़-सी सुनाई पड़ी थी\nमिट्टी के नीचे से \nपर उसके बाद कभी कुछ नहीं सुनाई पड़ा।\nउनका अनुमान था \nकुछ भूत बह गए सन्  सरसठ की बाढ़ में \nकुछ उड़ गए जेठ की पीली आँधी में \nजो बच गए चले गए शायद \nकिसी शहर की ओर\nधन्धे की तलाश में\nबेचारे भूत!\nकितने ग़रीब थे वे कि रास्ते में मिल गए\nतो आदमी से माँगते थे सिर्फ़ चुटकी-भर सुर्ती\nया महज़ एक बीड़ी\nअब रहा नहीं बस्ती में कोई सुनसान\nकोई सन्नाटा\nयहाँ तक कि नदी के किनारे का\nवह वीरान पीपल भी कट चुका है कब का\nसोचता हूँ - जब होते थे भूत\nतो कम से कम इतना तो करते थे\nकि बचाए रखते थे हमारे लिए,\nकहीं कोई बावड़ी\nकहीं कोई झुरमुट\nकहीं निपट निरल्ले में \nएकदम अकेला कोई पेड़ छतनार!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}