{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Nat | Rajesh Joshi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/ae854286\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":145,"description":"नट | राजेश जोशी\n\nदीमकें जगह-जगह से खा चुकी हैं तुम्हारे बाँसों को \nभूख खा चुकी है तुम्हारा सारा बदन\nक़दमों को साधकर चलते हो जिस रस्सी पर \nइस छोर से उस छोर \nटूट चुके हैं उसके रेशे, जर्जर हो चुकी है वो रस्सी \nजब-जब शुरू करते हो तुम अपना खेल \nकहीं बहुत क़रीब से आती है \nयम के भैंसे के खुरों की आवाज़ \nकहीं बहुत पास सुनाई पड़ती हैं \nउसके गले में लटकी घंटियाँ।\nनट!\nक्या कभी डर नहीं लगता तुम्हें?\nआशंका से कभी काँपते नहीं क्या तुम्हारे पाँव?\nसच कहते हो बाबू एकदम सच \nपर ज़रा कहो तो- \nयुद्ध में बार-बार घाव पर घाव सहते\nक्या कम जर्जर हुई है यह पृथ्वी? कीड़ों, मकोड़ों और चूहों ने क्या कम खाया है इस पृथ्वी को \nपर कौन डरता है बाबू इस धरती पर चलते हुए? \nक्या यहाँ कम साध कर चलना पड़ते हैं पाँव? \nजीवन की जोत पर जब तक टिकी रहें आँखें \nकौन डरता है यमराज के भैंसे से?\nमैं इस जर्जर रस्सी पर नहीं बाबू भरोसे की डोर पर चलता हूँ दिन रात।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}