{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Desh Ho Tum | Arunabh Saurabh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/ae99de93\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":197,"description":"देश हो तुम | अरुणाभ सौरभ में तुम्हारी कोख से नहींतुम्हारी देह के मैल सेउत्पन्न हुआ हूँभारतमाताविघ्नहरत्ता नहीं बना सकती माँ तुमपर इतनी शक्ति दो किभय-भूख सेमुत्ति का रास्ता खोज सकूँबुद्ध-सी करुणा देकरसंसार में अहिंसा - शांति-त्यागकी स्थापना होमें तुम्हारा हनुपवन पुत्रमेरी भुजाओं को वज्र शक्ति से भर दोकि संभव रहे कुछअमरत्व और पूजा नहींहमें दे दो अनथक कर्मनिर्भीक शक्ति सेबोलने कीस्वायत्ता सोचने कीसच्चाई लिखने कीसुनने कीदुःखित-दुर्बल जन मुक्तिगुनने - बुनने की शक्तिगढ़ने-रचने - बढ़ने कीसहने- कहने - सुनने कीकर्मरत रहने कीनिर्दोष कोशिश करने कीदमन मुक्त रहने कीजमके जीने कीनित सृजनरत रहने कीशक्ति..शक्ति...तुम्हारी मिट्टी के कण- कण से बनातुमने मुझे नहलाया, सींचा-सँवारातुम्हारी भाषा ने जगाकरमेरे भीतर सुप्त - तापउसी पर चूल्हा जोड़करपके भात को खाकरजवान हुआ हूँ मेंनीले आकाश कोअपनी छत समझकरतिसपर धमाचौकड़ी मचाते हुएदुधियायी रोशनी से भरा चाँद हैमेरे भीतर की रोशनीधरती से, जल सेआग से, हवा से, आकाश सेबना है, मेरा जीवनदेश हो तुममेरी सिहरनमेरी गुदगुदीआँसू- खून -भूख - प्यास सब।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}