{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Dekho Socho Samjho | Bhagwati Charan Verma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/ae9bb883\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":171,"description":"देखो-सोचो-समझो | भगवतीचरण वर्मा\n\nदेखो, सोचो, समझो, सुनो, गुनो औ' जानो\nइसको, उसको, सम्भव हो निज को पहचानो\nलेकिन अपना चेहरा जैसा है रहने दो,\nजीवन की धारा में अपने को बहने दो\n\nतुम जो कुछ हो वही रहोगे, मेरी मानो ।\n\nवैसे तुम चेतन हो, तुम प्रबुद्ध ज्ञानी हो\nतुम समर्थ, तुम कर्ता, अतिशय अभिमानी हो\nलेकिन अचरज इतना, तुम कितने भोले हो\nऊपर से ठोस दिखो, अन्दर से पोले हो\n\nबन कर मिट जाने की एक तुम कहानी हो ।\n\nपल में रो देते हो, पल में हँस पड़ते हो,\nअपने में रमकर तुम अपने से लड़ते हो\nपर यह सब तुम करते - इस पर मुझको शक है,\nदर्शन, मीमांसा - यह फुरसत की बकझक है,\n\nजमने की कोशिश में रोज़ तुम उखड़ते हो ।\n\nथोड़ी-सी घुटन और थोड़ी रंगीनी में,\nचुटकी भर मिरचे में, मुट्ठी भर चीनी में,\nज़िन्दगी तुम्हारी सीमित है, इतना सच है,\nइससे जो कुछ ज़्यादा, वह सब तो लालच है\n\nदोस्त उम्र कटने दो इस तमाशबीनी में ।\n\nधोखा है प्रेम-बैर, इसको तुम मत ठानो\nकडु‌आ या मीठा ,रस तो है छक कर छानो,\nचलने का अन्त नहीं, दिशा-ज्ञान कच्चा है\nभ्रमने का मारग ही सीधा है, सच्चा है\n\nजब-जब थक कर उलझो, तब-तब लम्बी तानो ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}