{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Tumhare Saath Rehkar | Sarveshwar Dayal Saxena","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/aed9f7cf\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":151,"description":"तुम्हारे साथ रहकर - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना\n\nतुम्हारे साथ रहकर \nअक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है \nकि दिशाएँ पास आ गई हैं, \nहर रास्ता छोटा हो गया है, \nदुनिया सिमटकर \nएक आँगन-सी बन गई है \nजो खचाखच भरा है, \nकहीं भी एकांत नहीं \nन बाहर, न भीतर। \nहर चीज़ का आकार घट गया है, \nपेड़ इतने छोटे हो गए हैं \nकि मैं उनके शीश पर हाथ रख \nआशीष दे सकता हूँ, \nआकाश छाती से टकराता है, \nमैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ। \nतुम्हारे साथ रहकर \nअक्सर मुझे महसूस हुआ है \nकि हर बात का एक मतलब होता है, \nयहाँ तक कि घास के हिलने का भी, \nहवा का खिड़की से आने का, \nऔर धूप का दीवार पर \nचढ़कर चले जाने का। \nतुम्हारे साथ रहकर \nअक्सर मुझे लगा है \nकि हम असमर्थताओं से नहीं \nसंभावनाओं से घिरे हैं, \nहर दीवार में द्वार बन सकता है \nऔर हर द्वार से पूरा का पूरा \nपहाड़ गुज़र सकता है। \nशक्ति अगर सीमित है \nतो हर चीज़ अशक्त भी है, \nभुजाएँ अगर छोटी हैं, \nतो सागर भी सिमटा हुआ है, \nसामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है, \nजीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है \nवह नियति की नहीं मेरी है। ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}