{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Sir Chupane Ki Jagah | Rajesh Joshi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/afd9bef2\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":256,"description":"सिर छिपाने की जगह  | राजेश जोशी \n\nन उन्होंने कुंडी खड़खड़ाई न दरवाज़े पर लगी घंटी बजाई\nअचानक घर के अन्दर तक चले आए वे लोग\nउनके सिर और कपड़े कुछ भीगे हुए थे\nमैं उनसे कुछ पूछ पाता, इससे पहले ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया\nकि शायद तुमने हमें पहचाना नहीं ।\nहाँ...पहचानोगे भी कैसे\nबहुत बरस हो गए मिले हुए\nतुम्हारे चेहरे को, तुम्हारी उम्र ने काफ़ी बदल दिया है\nलेकिन हमें देखो हम तो आज भी बिलकुल वैसे ही हैं\nहमारे रंग ज़रूर कुछ फीके पड़ गए हैं\nलेकिन क्या तुम सचमुच इन रंगों को नहीं पहचान सकते\nक्या तुम अपने बचपन के सारे  रंगों को भूल चुके हो\nभूल चुके हो अपने हाथों से खींची गई सारी रेखाओं को\nतुम्हारी स्मृति में क्या हम कहीं नहीं हैं?\nयाद करो यह उन दिनों की बात है जब तुम स्कूल में पढ़ते थे\nआठवीं क्लास में तुमने अपनी ड्राइंग कॉपी में एक तस्वीर बनाई थी\nऔर उसमें तिरछी और तीखी बौछारोंवाली बारिश थी\nजिसमें कुछ लोग भीगते हुए भाग रहे थे\nवह बारिश अचानक ही आ गई थी शायद तुम्हारे चित्र में\nचित्र पूरा करने की हड़बड़ी में तुम सिर छिपाने की जगहें बनाना भूल गए थे\nहम तब से ही भीग रहे थे और तुम्हारा पता तलाश कर रहे थे\nबड़े शहरों की बनावट अब लगभग ऐसी ही हो गई है\nजिनमें सड़कें हैं या दुकानें ही दुकानें हैं\nलेकिन दूर-दूर तक उनमें कहीं सिर छिपाने की जगह नहीं\nशक करने की आदत इतनी बढ़ चुकी है कि तुम्हें भीगता हुआ देखकर भी\nकोई अपने ओसारे से सिर निकालकर आवाज़ नहीं देता\nकि आओ यहाँ सिर छिपा लो और बारिश रुकने तक इन्तज़ार कर लो\nघने पेड़ भी दूर-दूर तक नहीं कि कोई कुछ देर ही सही\nउनके नीचे खड़े होकर बचने का भरम पाल सके\nइन शहरों के वास्तुशिल्पियों ने सोचा ही नहीं होगा कभी\nकि कुछ पैदल चलते लोग भी इन रास्तों से गुज़रेंगे\nएक पल को भी उन्हें नहीं आया होगा ख़याल \nकि बरसात के अचानक आ जाने पर कहीं सिर भी छिपाना होगा उन्हें\nसबको पता है कि बरसात कई बार अचानक ही आ जाती है\nसबके साथ कभी न कभी हो चुका होता है ऐसा वाकया\nलेकिन इसके बाद भी हम हमेशा छाता लेकर तो नहीं निकलते\nफिर अचानक उनमें से किसी ने पूछा \nकि तुम्हारे चित्र में होती बारिश क्या कभी रुकती नहीं\nतुम्हारे चित्र की बारिश में भीगे लोगों को तो\nतुम्हारे ही चित्र में ढूँढ़नी होगी कहीं\nसिर छिपाने की जगह\nउन्होंने कहा कि हम बहुत भीग चुके हैं जल्दी करो और बताओ\nकि क्या तुमने ऐसा...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}