{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Vo Ped | Shashiprabha Tiwari","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b16867d3\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":150,"description":"वो पेड़ | शशिप्रभा तिवारी\n\nतुमने घर के आंगन में \nआम के गाछ को रोपा था\nतुम उसी के नीचे बैठ कर \nसमय गुज़ारते थे \nउसकी छांव में \n लोगों के सुख दुख सुनते थे \nउस पेड़ के डाल के पत्ते \nउसके मंजर\nउसके टिकोरे \nउसके कच्चे पक्के फल\nसभी तुमसे बतियाते थे\nजब तुम्हारा मन होता \nअपने हाथ से उठाकर \nकिसी के हाथ में आम रखते \nकहते इसका स्वाद अनूठा है \nवह पेड़ किसी को भाता था\nकिसी को नहीं भी\nजैसे तुम कहते थे \nहर कोई मुझे पसंद करे \nज़रूरी तो नहीं \nपेड़ वहीं खड़ा आज भी \nतुम्हारी राह देखता है \nवह भूल गया है कि \nटूटे पत्ते, डाल, फल\nदोबारा उसके तने से \n नहीं जुड़ सकते \nकेशव! \nतुम भरी दोपहरी में \nउस पेड़ को याद दिला दो\nकि तुम द्वारका से \nमथुरा की गलियों को\nनहीं लौट सकते \nइस सफर में \nकदम-कदम आगे ही बढ़ते हैं \nलौटना और वापस लौटना \nज़िन्दगी में नहीं होता \nउम्र की तरह\nउसकी गिनती रोज़ बढ़ती जाती है \nतुम्हारे आंगन का\n वो पेड़ \nमुझे मेरी ज़िन्दगी के किस्से \nयाद दिलाता है \nमाधव! क्या करूं?","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}