{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Kukurmutta Prem | Kanishka","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b28d8dc5\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":316,"description":"कुकुरमुत्ता प्रेम | कनिष्का \n\nगोले के जिस डायामीटर में हम पैदा हुए\nवहाँ से शुरू हुई कथाएँ तालू से फुली और दंत के बीच फस गई\nऐसी दंत कथाए ओंघराए हैं मेरे तुम्हारे घर आँगन में\nशब्दों की नसबंदी में\nप्रेम कुकुरमुत्ता है\nकही भी उग आता है\nसंसार की माँ ने अपने मैल से जन्मा इस कवक को\nजो अपनारजक है संसार\nपर लगे तरकारी और झोर के दाग से सने कपड़ों पर\nधर्म के सरिए में सुरंग बना\nपंथी लोक को छोड़ते हुए\nकुकुरमुत्ता प्रेम ढूँढ़ लेता है मरते हुए लोगों को\nनौवारी साड़ी की दुल्हन के लेस से छुड़ाए गए कुकुरमुत्ते\nबरतन धोते धोते साबून बन गए\nउन्हें लाल रंग के समीप रखा\nउनसे महावारी\nआलता\nसिंदूर\nके यहाँ वहाँ पड़े छीटों को साफ करने\nया घरेलू हिंसा में गुंजल नसों से प्रवाहित खून धोने में लगाया\nकुकुरमुत्ता ज्यादातर वक्त अब\nजिजीविषा\nको घसने और हल्दी में ओंघराने में बिताता रहा\nतो उसका निकाह पढ़ा गया पीले रंग के साथ\nदुल्हिन पीला पहनती है कोहबर में\nहल्दी लगती है देह में\nदहेज की पीले रंग की अलमारी में बंद दुल्हिन\nउस दिन हुए पिलिया से भी ज़्यादा पीली रही\nउसे गर्म रखा जाता है सर्दियों में\nताकि जून तक आते आते पीली आग में झोंकी औरत\nगर्मी के पीलेपन का शिकार मानी जाएँ\nउसके शैवाल सीने पर उग आता है\nममता का आलाप\nजो नहीं समझेगी\nउस आदमी की नजर माँ के स्तन पर है\nतो कटकटाते हुए\nअपने ब्लाउज़ से निकालती बीड़ी\nऔर कुछ छुट्टे में रेंगती गंदी नज़रें रख आती है मस्जिद के दानपात्र में\nघर से निकलते ब्रा लेस औरत को ऐसे\nघूरा जाता\nजैसे शरीर के समस्त जीवाणु अपने\nब्रह्मांड की पराकाष्ठा पर ऊंघते हो एक तवायफ़ के जोगे में\nगगनचुम्बी बादल सी लड़की\nसूरज से रौशनी चुराती\nथाली में उतरा चाँद पीती थी\nवो आँसुओं से मुँह क्यों पोंछ रही\nजानने वाला ही उसका सच्चा प्रेमी है\nजो कुकुरमुत्ते वाला साग बना\nरोटी बेलते बेलते बेलन बनते हाथ में\nरख देता थोड़ा घी\nउसे पिघलाने में\nमर्दों के जूता पौलिश से\nकाली होती जा रही स्त्रियों को\nमंदिर से उखाड़\nखेतों में जोत दिया\nया उन्हें बागबानी सिखाई ताकि वह मिट्टी से जुड़ी रहे\nमिट्टी से गर्म रिश्ता मदद कर सके ज़िन्दा गाड़ने में हर दिन\nघर साफ सुथरा रहे इसलिए मर्दों ने घर पर रोका\nझाड़ू लगाते लगाते सीको में तब्दील होती औरतों को\nपर अब लकड़ियाँ काटते-काटते कुल्हाड़ी\nबनती औरतें सबसे खूबसूरत लगती है वो काटना जानती है\nऔरतों...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}