{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Vo Kahan Hain Jo Kavita Likhti Hain | Rupam Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b39ac10e\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":169,"description":"वो कहाँ हैं जो कविता लिखती हैं | रूपम मिश्र वे बहुत दिन बाद आए हैं भइया के सखा हैं तो रवायतन मेरे भइया हैं किसी पत्रिका में मेरी कविता पढ़ अभिभूत हैंभइया से अक्सर मेरा बखान करते एक बार मिलना चाहते भइया भी अप्रत्याशित गर्व से भर जाते और लखनऊ आने पर मुझसे मिलवाने का वादा करतेफिर जल्दी संजोग बना भतीजे के हैप्पी बर्थ डे में वे पधारे भइया ने भीड़ में से मुझे बुलाया और हहर कर बताया इनको नहीं पहचान रही हो ये अमरेंदर हैं बहरिया के याद नहीं, पहले कितना घर आते थे अब यहीं रशद विभाग में इंस्पेक्टर हैंअपने घर-जवार की चिन्हारी में ढला हम भाई-बहनों का मन पिता, चाचा, आजा के जनारी भर की हमारी दुनिया यहाँ उजाला भी उनकी ही खादी की धोतियों से छनकर आता था सँझियरई में बिहँसे हमारे गँवई चित्त हम मनुष्य भी उतने ही थे जितना चीन्ह में आते थेभइया के जेहन में कैसे आती मेरी कोई अलग पहचान हम दोनों एक-दूसरे को याद नहीं थे रोज घर आने से क्या होता हैसयानी लड़कियाँ क्या बैठक तक आती हैं मैंने काफी कोशिश की कि उन्हें भर निगाह देख कर नमस्ते कहूँ पर सब बेकारसनई के बोझ से गरुवाई स्थानीयता मुझ पर काबिज हो गई जड़ संकोच से पलकें ऐसे कनरी कि तर से उप्पर न हुईं ढाक के भीगे पेड़-सी खड़ी रही अन्ततः उन्होंने अभिवादन करके निहायत जहीन अन्दाज में मुझसे कहा अच्छा, 'वे कहाँ हैं जो कविता लिखती हैं।'","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}