{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Char Kauwe | Bhawani Prasad Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b4474554\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":164,"description":"चार कौए | भवानी प्रसाद मिश्र\nबहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले\nउन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले\nउनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें\nवे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें।\n\nकभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में\nदुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में\nये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये\nइनके नौकर चील, गरूड़ और बाज़ हो गये।\n\nहंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में\nहाथ बांधकर खडे़ हो गए सब विनती में\nहुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें\nपिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गायॆं ।\n\nबीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को\nखाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को\n\nकौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में\nबड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में\nउड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले\nउड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले ।\n\nआगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है\nयह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन है\nउत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जाना\nलंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}