{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Jo Maar Kha Royi Nahin | Vishnu Khare","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b4a2cdb8\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":137,"description":"जो मार खा रोईं नहीं | विष्णु खरेतिलक मार्ग थाने के सामनेजो बिजली का एक बड़ा बक्स हैउसके पीछे नाली पर बनी झु्ग्गी का वाक़या है यहचालीस के क़रीब उम्र का बापसूखी सांवली लंबी-सी काया परेशान बेतरतीब बढ़ी दाढ़ीअपने हाथ में एक पतली हरी डाली लिए खड़ा हुआनाराज़ हो रहा था अपनीपांच साल और सवा साल की बेटियों परजो चुपचाप उसकी तरफ़ ऊपर देख रही थींग़ु्स्सा बढ़ता गया बाप कापता नहीं क्या हो गया था बच्चियों सेकु्त्ता खाना ले गया थादूध, दाल, आटा, चीनी, तेल, केरोसीन में सेक्या घर में था जो बगर गया थाया एक या दोनों सड़क पर मरते-मरते बची थींजो भी रहा हो तीन बेंतें लगी बड़ी वाली को पीठ परऔर दो पड़ीं छोटी को ठीक सर परजिस पर मुण्डन के बाद छोटे भूरे बाल आ रहे थेबिलबिलाई नहीं बेटियाँ एकटक देखती रहीं बाप को तब भीजो अन्दर जाने के लिए धमका कर चला गयाउसका कहा मानने से पहलेबेटियों ने देखा उसेप्यार, करुणा और उम्मीद सेजब तक वह मोड़ पर ओझल नहीं हो गया","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}