{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Pansokha Hai Indradhanush | Madan Kashyap","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b525fd39\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":380,"description":"पनसोखा है इन्द्रधनुष - मदन कश्यप \n\nपनसोखा है इन्द्रधनुष\n\nआसमान के नीले टाट पर मखमली पैबन्द की तरह फैला है।\n कहीं यह तुम्हारा वही सतरंगा दुपट्टा तो नहीं \nजो कुछ ऐसे ही गिर पड़ा था मेरे अधलेटे बदन पर \nतेज़ साँसों से फूल-फूल जा रहे थे तुम्हारे नथने \nलाल मिर्च से दहकते होंठ धीरे-धीरे बढ़ रहे थे मेरी ओर \nएक मादा गेहूँअन फुंफकार रही थी \nक़रीब आता एक डरावना आकर्षण था\n मेरी आत्मा खिंचती चली जा रही थी जिसकी ओर \nमृत्यु की वेदना से ज़्यादा बड़ी होती है जीवन की वेदना\n\nदुपट्टे ने क्या मुझे वैसे ही लपेट लिया था जैसे आसमान को लपेट रखा है।\n पनसोखा है इन्द्रधनुष \nबारिश रुकने पर उगा है या बारिश रोकने के लिए उगा है\n\nबारिश को थम जाने दो \nबारिश को थम जाना चाहिए\nप्यार को नहीं थमना चाहिए\n\nक्या तुम वही थीं \n\nजो कुछ देर पहले आयी थीं इस मिलेनियम पार्क में\n\nसीने से आईपैड चिपकाए हुए\n\nवैसे किस मिलेनियम से आयी थीं तुम \nप्यार के बाद कोई वही कहाँ रह जाता है जो वह होता है\n\nधीरे-धीरे धीमी होती गयी थी तुम्हारी आवाज़  \nक्रियाओं ने ले ली थी मनुहारों की जगह \nईश्वर मंदिर से निकलकर टहलने लगा था पार्क में\n\nधीरे-धीरे ही मुझे लगा था\n\nतुम्हारी साँसों से बड़ा कोई संगीत नहीं \nतुम्हारी चुप्पी से मुखर कोई संवाद नहीं \nतुम्हारी विस्मृति से बेहतर कोई स्मृति नहीं\n पनसोखा है इन्द्रधनुष\n\nजिस प्रक्रिया से किरणें बदलती हैं सात रंगों में \nउसी प्रक्रिया से रंगहीन किरणों से बदल जाते हैं सातों रंग\n\nहोंठ मेरे होंठों के बहुत क़रीब आये\n\nमैंने दो पहाड़ों के बीच की सूखी नदी में छिपा लिया अपना सिर\n\nबादल हमें बचा रहे थे सूरज के ताप से \nपाँवों के नीचे नर्म घासों के कुचलने का एहसास हमें था \nदुनिया को समझ लेना चाहिए था\n\nहम मांस के लोथड़े नहीं प्यार करने वाले दो ज़िंदा लोग थे\n महज़ चुम्बन और स्पर्श नहीं था हमारा प्यार \n वह कुछ उपक्रमों और क्रियाओं से हो सम्पन्न नहीं होता था\n\nहम इन्द्रधनुष थे लेकिन पनसोखे नहीं \nअपनी-अपनी देह के भीतर ढूँढ़ रहे थे अपनी-अपनी देह \nबारिश की बूँदें जितनी हमारे बदन पर थीं उससे कहीं अधिक हमारी आत्मा में\n\nजिस नैपकिन से पोंछा था तुमने अपना चेहरा मैंने उसे कूड़ेदान में नहीं डाला था \nदहकते अंगारे से तुम्हारे निचले होंठ पर तब भी बची रह गयी थी एक मोटी-सी बूँद \nमैं उसे अपनी तर्जनी पर उठा लेना चाहता था पर निहारता ही रह...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}