{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Andhere Ki Bhi Hoti Hai Ek Vyavastha | Anupam Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b630b320\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":222,"description":"अँधेरे की भी होती है एक व्यवस्था | अनुपम सिंह \n\nअँधेरे की भी होती है एक व्यवस्था\nचीज़ें गतिमान रहती हैं अपनी जगहों पर\nबादल गरजते हैं कहीं टूट पड़ती हैं बिजलियाँ\nबारिश अँधेरे में भी भिगो देती है पेड़\nपत्तियों से टपकता पानी सुनाई देता है\nअँधेरे के आईने में देखती हूँ अपना चेहरा\nतुम आते तो दिखाई देते हो\nबस! ख़त्म नहीं होतीं दूरियाँ\nआँसू ढुलक जाते हैं गालों पर\nअँधेरे में भी दुख की होती है एक चमक\nदूर दी जा रही है बलि\nअँधेरे में भी सुना जा सकता है फ़र्श पर गिरा चाकू\nकोई होता तो रख देता हाथ\nमेरी काँपती-थरथराती देह पर\nअँधेरे में भी उठ रही है चिताओं से गंध\nराख उड़कर पड़ रही है फूलों पर\nहाथ से छुई जा सकती है ताज़ा खुदी कब्रों की मिटटी \nवहाँ अभी भी जाग रही हैं मुर्दे की इच्छाएँ\nखेल रहे हैं दो बालक उसके\nअँधेरे में भी सुनी जा सकती है उनके हृदय की धकधक\nबिल्ली अँधेरे में भी खेलती है अपने बच्चों संग\nऔर कवि गढ़ लेता उजाले का बिम्ब\nअँधेरे में भी लादे-फाँदे रेलगाड़ियाँ\nपहुँच जाती हैं कहाँ से कहाँ\nएक अँधेरे से दूसरे अँधेरे में पैदल ही पहुँच जाते हैं।\nबच्चे बूढ़े औरतें और अपाहिज \nसुनाई देती है उनकी कातर पुकार\nअँधेरे में भी उपस्थित रहता है ब्रम्हांड\nअँधेरे-उजाले से परे घूमती रहती है पृथ्वी\nअँधेरे के आर-पार घूमते हैं नक्षत्र सारे\nअँधेरे की भी होती है व्यवस्था\nअँधेरे में अंकुरित होते हैं बीज\nसादे काग़ज अँधेरे में भी करते हैं इंतज़ार \nकिसी क़लम का\nलिखे जाने को समय की कविता।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}