{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Atmasweekar | Gaurav Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b648641f\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":149,"description":"आत्मस्वीकार | गौरव सिंह\n\nजो अपराध मैंने किये,\nवो जीवन जीने की न्यूनतम ज़रूरत की तरह लगे!\nमैंने चोर निगाहों से स्त्रियों के वक्ष देखे\nऔर कई बार एक लड़की का हृदय ना समझ सकने की शर्म के साथ सोया\nमुझे परिजनों की मौत पर रुलाई नहीं फूटी\nऔर कई दफ़े चिड़ियों की चोट पर फफककर रोया\nमैं अपने लोगों के बीच एक लम्बी ऊब के साथ रहा\nऔर चाय बेचती एक औरत का सारा दुःख जान लेना चाहा\nमैंने रातभर जागकर लड़कियों के दुःख सुने\nपर अपनी यातनाएँ कहने के लिए कोई नदी खोजता रहा\nमुझे अपनी पीड़ाएँ बताने में संकोच होता है\nमैं बीमारी से नहीं, उसकी अव्याख्येयता के कारण कुढ़ता हूँ\nजीवन के कई ज़रूरी क्षण भूल रहा हूँ\nऔर तुम्हारे तिलों की ठीक जगह ना बता पाने पर शर्मिंदा हूँ\nमुझ पर स्मृतिहीन होने के लांछन ना लगाओ\nमैं पानी के चहबच्चों की स्मृतियाँ लिए शहर-दर-शहर भटक रहा हूँ\nजितनी मनुष्यता मुझे धर्मग्रंथों ने नहीं सिखायी\nउससे कहीं ज़्यादा प्रेम एक बीस साल की लड़की ने सिखाया\nप्रेम में होकर मैंने ज़िन्दगी पर सबसे अधिक गौर किया\nमैं यह मानने को तैयार नहीं कि प्रेम किसी को जीवन से विमुख कर सकता है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}