{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Chait Ki Chaupahi | Dinesh Kumar Shukla","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b811fe8b\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":329,"description":"चैत की चौपही - दिनेश कुमार शुक्ल\nदिन नेवर्तों के महीना चैत का है\nपड़ चले फीके मगर रह-रह दहकते हैं अभी तक रंग होली के\nहवा के तेवर जरा बदले हुए हैं और गाढ़ी हो चली है धूप\nफसल के पकने का मौसम आ गया पर लॉक अब तक हरी है\nइस बार भुस तो बहुत होगा किन्तु दाने कम पड़ेंगे बालियों में\nमगर कोई क्या करे!\nदिन नेवर्तों के महीना चैत का है\nचौपही में सज सँवर कर स्वाँग निकलेंगे,\nजग रही है रूप-रूपक की वो दिल-अंगेज दुनिया-\nफाँद कर संसार उसके पार का संसार रचती\nबुलबुले में रंग भरती\nकिसी फक्कड़ शरारत की हरारत माहौल में है\nएक पल को पलक खोलो ध्यान गहराओ तो पाओगे\nयहीं इस अधगिरी चौपाल में कुछ लोग बैठे सज रहे होंगे-\nभेस धर कर कोई डाइन का पहन कर रात काली\nहाथ में छप्पर व मूसल ले के गलियों में छमाछम दौड़ता\nसंसार को ललकारता, आतंक को मुँह बिराता-सा आ रहा होगा,\nकोई पागल बनके ठरें की महक में बलबलाता\nपाँव में दस हाथ की जंजीर बाँधे घूमता होगा तुड़ा कर,\nकोई जोकर कोई भालू औ कोई अरधंग बन कर\nकोई गालों में चुभोकर साँग लोहे की\nहवा पर चला रहा होगा दुखों से बहुत ऊपर\nचौपही में देव-दानव-ठग-अधम-सज्जन सभी के रूप होंगे\nभाँजते अपनी बनैठी चल रहे होंगे कई इतिहास\nऔर करतब पटेबाज़ी के दिखाता तर्क भी होगा\nमौत के काँधे पे धर के हाथ हँसती जिन्दगी होगी\nसात पर्तों में हवा की तरसा-मरसा बज रहा होगा\nकान के पर्दों में दँहिकी गमकती होगी\nऔर पानी के गले में गूँजता होगा कुआँ\nउधर ऊपर चन्द्रमा के पास खिड़की खोल कर\nअर्धपरिचित एक चेहरा झाँकता होगा,\nदूर जाती और गहरे डूबती-सी मुस्कुराहट की कठिन आभा\nवहीं पर खो रही होगी,\nऔर झालर की तरह उड़ती हुई चिड़ियाँ\nगगन की अस्त होती नीलिमा में लहर भरती जा रही होंगी-\nतब गगन के काँपते जल में वो चेहरा डूब जायेगा!\nचौपही का ढोल धरती की तरह प्रतिध्वनित होता\nरात भर बजता रहेगा और तारों से झरेगी धूल,\nतनी गेहूँ की कँटीली बालियों की झील पर तब चन्द्रमा-सी एक थाली\nसरकती दस कोस तक हँसती फिसलती चली जायेगी\nभेड़िये उस फसल में जो छिपे हैं अब डर रहे होंगे!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}