{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Adrak | Ekta Verma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b83b1f11\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":227,"description":" अदरक।  एकता वर्मा \n\nइनकी देह दुखों की अंतर्मुखी गाँठों से बनी थी \nजिन्होंने अपनी कब्रों की मिट्टी ठेलकर अपनी देह के लिए जगह बनाई थी।\n\nये आतताइयों का चरित्र पहचानते थे \nऔर उनके द्वारा कच्चा चबाए जाने के खिलाफ \nसुख की जिह्वा पर कसैलेपन की तरह उतरते थे। \n\nवे आघातों को अपनी छाती पर सहते थे \nइनका आखिरी कतरा  \nप्रतिबद्धताओं की तीखी गंध से महकता था। \n\nवे रक्तबीज जैसे थे, उनके टुकड़े जहाँ गिरते \nहुजूम की शक्ल में वहीं से उग आते। \nउनका शरीर लोहे के तंतुओं से बँधा था \nउनको तोड़कर बंदरबाँट करना आसान नहीं था। \n\nएक दिन, इनमें से किसी ने\nजिसके पिता का नाम शंबूक था,\nने किताब का आखिरी पृष्ठ पलटकर कहा- यह हमारी कहानी नहीं है।\nइस इतिहास को जला देना चाहिए !\n\n द्रोणाचार्य की संतानों वाली सभा चीख उठी-  \nखीं-खीं, खीं-खीं !!! \n\nएक औरत ने जो अहिल्या की परपौत्री थी, और मेड्यूसा की नातिन, ने कहा-\nमेरी योनि \nएक मज़दूर की तरह खटते हुए \nअसंतोष का नारा उछालना चाहती है,\nबलत्कृत कामनाओं के नीचे दबा सुख का स्पन्दन खोज लाना चाहती है।\n\nदेवराजों की सभा चिल्लाने लगी, नुकेले दांतों से नोचने-फाड़ने लगी \nछी: छी: दुर्दांत! पतिता! \nजंगल से खदेड़ी गई जातियों का एक वारिस\nराजधानी के शिक्षण संस्थान में,\nशोध-प्रबंध में उद्धृत करने लगा \nअपने पुरखों के हत्यारों की सूची  \n\nसाक्षात्कार समिति चीखी- खीं-खीं, खीं-खीं \nखारिज करो, फेंको, बाहर करो!\n\nये तिरस्कृत, बहिष्कृत, अपमानित होती जातियाँ \nचाहतीं तो एक तटस्थ, समझौतावादी जीवन चुन सकती थीं।\nलेकिन सहमति में झुके सारों के बीच \nजहाँ असहमति की उंगली उठाना अपराध हो, \nवे ओखली में सिर डालकर \nमूसलों को चुनौती देना धर्म की तरह चुनते हैं। \n\nवे अदरक की तरह जीते थे।\nइनके होने भर से आतताइयों की नंगई ऐसे उघड़ती थी \nकि वे चीखते-उछलते दाँत -नाखून दिखाते, \nबंदरों के हुजूम सा दिखते। \n\nवही बंदर जो अदरक का स्वाद नहीं जानते।\n\nदरअसल सभ्यता के विकास-क्रम में पिछड़े इन अमानुषों के लिए स्वाद भोग का विषय है \nजबकि मेहनतकशों के लिए वह संघर्ष का पर्याय था\nजिन्होंने अपनी जिह्वा पर रोटी से कहीं ज़्यादा, \nआंसुओं के स्वाद को चखा था,\nपसीने और पेशाब को चखा था।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}