{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Dharti Par Hazaar Cheezain Thin | Anupam Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/b8db1268\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":210,"description":"धरती पर हज़ार चीजें थीं काली और खूबसूरत | अनुपम सिंह \n\nधरती पर हज़ार चीजें थीं\nकाली और खूबसूरत\nउनके मुँह का स्वाद\nमेरा ही रंग देख बिगड़ता था\nवे मुझे अपने दरवाज़े से ऐसे पुकारते\nजैसे किसी अनहोनी को पुकार रहे हों\nउनके हज़ार मुहावरे मुँह चिढ़ाते थे\nकाली करतूतें काली दाल काला दिल\nकाले कारनामे\nबिल्लियों के बहाने दी गई गालियाँ सुन\nमैं ख़ुद को बिसूरती जाती थी\nऔर अकेले में छिपकर रोती थी\nपहली बार जब मेरे प्रेम की ख़बरें उड़ीं\nतो माँ ओरहन लेकर गई\nउन्होंने झिड़क दिया उसे\nकि मेरे बेटे को यही मिली है प्रेम करने को\nमुझे प्रेम में बदनाम होने से अधिक\nयह बात खल गई थी\nउन्होंने कच्ची पेंसिलों-सा\nतोड़ दिया था मेरे प्रेम करने का पहला विश्वास\n\nमैंने मन्नतें उस चौखट पर माँगी\nजहाँ पहले ही नहीं था इंसाफ़\nकई-कई फ़िल्मों के दृश्य\nजिनमें फ़िल्माई गई थीं काली लड़कियाँ\nसिर्फ़ मज़ाक बनाने के लिए\nअभी भी भर आँख देख नहीं पाती हूँ\nतस्वीर खिंचाती हूँ\nतो बचपन की कोई बात अनमना कर जाती है।\nसोचती हूँ\nकितनी जल्दी बाहर निकल जाऊँ दृश्य से\nकाला कपड़ा तो ज़िद में पहना था \nहाथ जोड़ लेते पिता\nबिटिया! मत पहना करो काली कमीज़\nवैसे तो काजल और बिंदी यही दो श्रृंगार प्रिय थे\nअब लगता है कि काजल भी ज़िद का ही भरा है\nउनको कई बार यह कहते सुना था\nकि काजल फबता नहीं तुम पर\nदेवी-देवताओं और सज्जनों ने मिलकर\nकई बार तोड़ा मुझे\nमैं थी उस टूटे पत्ते-सी\nजिससे जड़ें फूटती हैं।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}