{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Azadi Abhi Adhoori Hai | Sheoraj Singh Bechain","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/bafb9fb0\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":272,"description":"आज़ादी अभी अधूरी है-सच है यह बात समझ प्यारे।कुछ सुविधाओं के टुकड़े खा-मत नौ-नौ बाँस उछल प्यारे।गोरे गैरों का जुल्म था कलअब सितम हमारे अपनों काये कुछ भी कहें, पर देशबना नहीं भीमराव के सपनों का।एक डाल ही क्यों? एक फूल ही क्‍यों?सारा उद्यान बदल प्यारे।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है ये बात समझ प्यारे।है जिसका लहू मयखाने मेंवो वसर आज तसना-लव हैकुत्तों की हालत बदली हैदलितों की ज़िन्दगी बदतर है।कर हकों की ठंडी बात नहींबदलाव की आग उगल प्यारेआज़ादी अभी अधूरी है।सच है ये बात समझ प्यारे।यह सोच कुँवारी बहन है क्‍यों?माँ-बाप का दिल बेचैन है क्‍यों?पढ़-लिख के मिली बेकारी क्‍यों?मेहनत का फल बेज़ारी क्‍यों?तू मेरे ग़म की बात न करअपना तो दर्द समझ प्यारे ।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।नेता, तस्कर धनवान हैं क्‍यों?हम दलितों का अपमान है क्‍यों?भूखे-नंगे भिखमंगों सेभर रहा ये हिन्दुस्तान है क्‍यों?शोषक जाति और धर्मोंके भी बने देश में दल प्यारे।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।तू वर्दी के व्यभिचार देखखादी की कोठी-कार देखपहले पॉकेट का भार देखफिर रिश्तों का बाज़ार देखरोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा-का कुछ प्रबन्ध तो कर प्यारे।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।हाँ, पूँजीवादी दानव सेखतरे में है शोषित मानवतागूँगे-बहरों से क्या कहिए?अटकी है गले में व्यथा-कथा।पत्थर दिल पर, कोई असर नहींमें तिल-तिल रहा पिचल प्यारे ।आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।जिनके हाथों से महल बनेवे खुली सड़क पर लोग पड़ेतन पर कपड़े का तार नहींबुन-बुन कर के भंडार भरेखूँखार भेड़िया-सा दिल मेंसरमायेदारों का है डर प्यारे।आज़ादी अभी अधूरी हैसच है यह बात समझ प्यारे।“बन्दी” बेगुनाह, बरी खूनीक्या यह सारा कुछ कानूनी ?मजदूरों की दुनिया सूनीबढ़ रही मुसीबत दिन दूनीपट॒टे दलितों के नामखेत में गेर दलित का हल प्यारे।आजादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।निज देश की कंचन काया मेंयह वर्ण-विषमता कोढ़ हुआ।कहीं शोषक, शासक बन बैठाकहीं दोनों में गठजोड़ हुआ।क्या लोकतनन्‍्त्र? कल के राजे-गये मन्त्री बन, सज-धज प्यारे?आज़ादी अभी अधूरी है।सच है यह बात समझ प्यारे।भूखों की भूख मिटा न सकाशोषण और लूट बचा न सको।जिस सुबह की ख़ातिर दलित मरवो सुबह अभी तक आ न सकादख-सख समान किस तरह वैंटयह यक्ति सोच पल छिन प्यार।आजादी अभी...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}