{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Sheher Ki Subah | Adnan Kafeel Darwesh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/bcfa8b7c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":171,"description":"शहर की सुबह / अदनान कफ़ील दरवेशशहर खुलता है रोज़ानाकिसी पुराने सन्दूक़-सा नहींकिसी बच्चे की नरम मुट्ठियों-सा नहींबल्कि वो खुलता है सूरज की असँख्य रौशन धारों सेजो शहर के बीचों-बीच गोलम्बरों पर गिरती हैंऔर फैल जाती हैं उन तारीक गलियों तकजहाँ तक जाने में एक शरीफ़ आदमी कतराता हैलेकिन जहाँ कुत्ते और सुअर बेधड़क घुसे चले जाते हैंशहर खुलता है मज़दूरों की क़तारों सेजो लेबर-चौकों को आरास्ता करते हैंशहर खुलता है एक शराबी की तनी आँखों मेंनौकरीपेशा लड़कियों की धनक से खुलता है शहर,गाजे-बाजे और लाल बत्तियों की परेडों से नहींबल्कि रिक्शे की ट्रिंग-ट्रिंगऔर दूध के कनस्तरों की उठा-पटक से खुलता हैशहर रेलयात्रियों के आगमन से खुलता हैउनके आँखों में बसी थकान से खुलता हैशहर खुलता है खण्डहरों में टपकी ओस सेजहाँ प्रेमी-युगल पाते हैं थोड़ी-सी शरणशहर खुलता है गन्दे सीवरों में उतरते आदमीनुमा मज़दूर सेशहर भिखमँगों के कासे में खुलता है; पहले सिक्के की खनक सेशहर खुलता है एक नए षड्यन्त्र सेजो सफ़ेदपोशों की गुप्त-बैठकों में आकर लेता हैशहर खुलता है एक मृतक सेजो इस लोकतन्त्र में बेनाम लाश की तरहशहर के अन्धेरों में पड़ा होता हैशहर खुलता है पान की थूकों सेउबलती चाय की गन्ध सेशहर खुलता है एक कवि की धुएँ से भरी आँखों मेंजिसमें एक स्वप्न की चिताअभी-अभी जल कर राख हुई होती है...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}