{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Jo Kuch Dekha-Suna, Samjha, Likh Diya | Nirmala Putul","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/bff8a814\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":148,"description":"जो कुछ देखा-सुना, समझा, लिख दिया | निर्मला पुतुल\n\nबिना किसी लाग-लपेट के \nतुम्हें अच्छा लगे, ना लगे, तुम जानो \n\nचिकनी-चुपड़ी भाषा की उम्मीद न करो मुझसे \nजीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलते \nमेरी भाषा भी रूखड़ी हो गई है \n\nमैं नहीं जानती कविता की परिभाषा \nछंद, लय, तुक का कोई ज्ञान नहीं मुझे \nऔर न ही शब्दों और भाषाओं में है मेरी पकड़ \n\nघर-गृहस्थी सँभालते \nलड़ते अपने हिस्से की लड़ाई \nजो कुछ देखा-सुना-भोगा \nबोला-बतियाया \nआस-पड़ोस में संगी-साथी से \nलिख दिया सीधा-सीधा समय की स्लेट पर \nटेढ़े-मेढ़े अक्षरों में, जैसे-तैसे \n\nतुम्हारी मर्ज़ी तुम पढ़ो न पढ़ो! \nमिटा दो, या कर दो नष्ट पूरी स्लेट ही \nपर याद रखो। \nफिर कोई आएगा, और लिखे-बोलेगा वही सब कुछ \nजो कुछ देखे-सुनेगा \nभोगेगा तुम्हारे बीच रहते \n\nतुम्हारे पास शब्द हैं, तर्क हैं, बुद्धि है \nपूरी की पूरी व्यवस्था है तुम्हारे हाथों \nतुम सच को झुठला सकते हो बार-बार बोलकर \nकर सकते हो ख़ारिज एक वाक्य में सब कुछ मेरा \n\nआँखों देखी को \nग़लत साबित कर सकते हो तुम \nजानती हूँ मैं \n\nपर मत भूलो! \nअभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुए \nसच को सच \nऔर झूठ को \nपूरी ताक़त से झूठ कहने वाले लोग! ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}