{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Baaghi Biyabaan Auratein | Aishwarya Tiwari","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/c0b7a37c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":236,"description":"बागी बियाबान औरतें।  ऐश्वर्या तिवारी\n \nलोग कहते हैं\nवो औरत है ही कहाँ,\nज़्यादा  सही शब्द है\nआफ़त।\nउसके गले में कोई मंगलसूत्र नहीं,\nएक सूखी नदी लटकी है\nजिस पर कभी किसी ने नाव चलाने की ज़िद की थी\nऔर आधे में ही डर गया।\nवो हँसती है तो लगता है\nजैसे किसी पुराने मकान की दीवार\nअचानक गिर पडी हो -\nलोग भागते हैं मलबा बचाने,\nवो बस अपनी हँसी से धूल झाड़ती है।\nउसकी देह पर कपड़े कम हैं,\nकिस्से ज़्यादा।\nहर तह से कोई मर्द निकलता है\nजो कभी उसे देवी बुलाता था,\nकभी डायन,\nऔर कभी 'दोस्त',\nऔर हर नाम के साथ\n\nउसके भीतर की मिट्टी और पत्थर\nथोड़े-थोड़े हमेशा बदलते रहे हैं।\nवो बियाबान है\nक्योंकि उसने अपने भीतर की\n हरी घास खुद उखाड़कर फेंक दी थी। \nजिस दिन उसे समझ आया\nकि लोग उसकी खूबसूरती पर नहीं,\nउसकी \"कमीज़ की आख़िरी बटन\" पर\nकविताएं लिखते हैं।\nउस रात उसने अपने सीने पर हाथ रखकर कहा था\n\"ये दिल नहीं, अदालत है,\nऔर आज से सिर्फ यहाँ एक ही मुकदमा चलेगा\nख़ुद बनाम दुनिया।\"\n\nवो चाय बनाते हुए भी\nइंक़लाब सोचती है,\nलोटे में पानी भरते हुए\nआज़ादी मापती है,\nऔर जब दुपट्टा झाड़ती है\nतो जैसे सदियों की धूल\nआसमान पर फेंक देती है\nकोई तारा कम भी हो जाए,\nतो उसे कोई परवाह नहीं।\nउसकी चाल में बाज़ार की चालाकी नहीं,\nकब्रिस्तान जैसी सच्चाई है -\nशांत, साफ़, अन्तिम।\nवो किसी की अमानत नहीं,\nना बाप की इज्ज़त,\nना पति की नाक,\nना प्रेमी का राज़\n\nवो अपने ही गुनाहों की\nइकलौती वारिस है -\nगिनती भी खुद रखती है,\nऔर माफ़ी भी खुद दे देती है।\nलोग उसे \"बागी\" बुलाते हैं \nक्योंकि वो \"हाँ से पहले\n\"क्यों' पूछ लेती है,\n\"कब लौटोगे?\" से पहले\n\"क्यों रहूं\" सोच लेती है।\nवो बियाबान है\nपर सूखा नहीं।\nउसके भीतर किसी पुराने मेहबूब की\nभूली हुई ख़ुशबू बसी हुई है \nकभी-कभी रात में\nवो खुद से पूछती है -\n\"अगर मैं इतनी ही बुरी हूँ \nतो मेरी आँख  में पानी का एक कतरा\n\nअब भी क्यों बाकी है?\"\nकोई जवाब नहीं देता।\nबस उसकी परछाई\nदीवार से उतरकर\nउसके साथ बैठ जाती है।\nदोनों मिलकर सिगरेट सुलगाती हैं,\nएक ही धुए को भीतर खींचती हैं\nफ़र्क़ बस इतना है,\nकि एक की आँख  में आँसू हैं,\nऔर दुसरे की आँख में आग।\nसुबह होते-होते\nआग और आँसू\nएक ही नमी में बदल जाते हैं।\nऔर वो औरत,\n\nजो शहर की नज़रों में\n\"बागी बियाबान\" है,\nअपने भीतर से\nचुपचाप एक नन्हा सा बीज उठाती है,\nज़मीन में नहीं,\nज़ुबान पर बो देती...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}