{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Barbie Aur Sadak | Shashwat Upadhyay","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/c15b4d23\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":113,"description":"बार्बी और सड़क | शाश्वत उपाध्याय \n\nमुझे मुड़ती हुई सड़कों पर बहुत प्यार आता है \nसड़क, जो मेरे बचपन के पसंदीदा बार्बी की कमर की तरह है \nबड़े करीने से मुड़ रही हो \nजिस पर मैं लट्टुओं की तरह बेतरतीब चलता हूँ, कुलांचे भरत हूँ \nऐसी चल में चलता हूँ कि कमर मटक जाती है \nकि चलना खराब लग जाता है \nयह सब कुछ इसलिए होता है \nकि सड़क का मुड़ना \nबार्बी के कमर जैसा समझ आता है \nवैसा नहीं समझ आता जैसा है \nअभी मुड़ती सड़कों पर प्यार करने का समय है \nइन पर चलने का समय अभी नहीं आया\nमेरी गुज़ारिश है कि प्यार करने से थोड़ा समय बचाओ \nऔर मुड़ती सड़कों पर साथ चलो \nआओ, चलने के सहारे हम खिलौने के बैग तक पहुँचें\nऔर उसकी गुड़ियों को छिपा दें \nकि सड़क देखकर सिर्फ बार्बी के कमर का ख़याल आए \nतो दोष ख़याल का नहीं खिलौनों का है \nउम्मीद करें की हम आखरी पीढ़ी हों \nजिन्हें बार्बी से प्यार था ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}