{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Krantipurush | Chitra Pawar","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/c417cca7\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":160,"description":"क्रांतिपुरुष | चित्रा पँवार \n\nकल रात सपने के बगीचे में हवाखोरी करते\nभगत सिंह से मुलाकात हो गई\nमैंने पूछा शहीव-ए-आज़म!\nतुम क्रांतिकारी ना होते तो क्‍या होते?\nवह ठहाका मारकर हँसे\nफिर भी क्रांतिकारी ही होता पगली !\nखेतों में धान त्रगाता\nहल चलाता और भूख के विरुद्ध कर देता क्रांति\nमगर सोचो अगर खेत भी ना होते तुम्हारे पास!\nतब क्‍या करते!!\nफिर,,ऐसे में कल्रम उठाता\nनिर्धन, मजबूर के हक़ हिस्से की मांग करता\nरच देता कोई क्रांति गीत जमींदारों, मील मालिकों, सरकारों के जुल्मों के खिलाफ\nमतलब कलम पाकर भी क्रान्तिकारी ही रहते?\nहा हा हा बिलकुल!\nजरा सोचो जब निर्धन की पक्षधर होने के जुर्म में\nछीन ली जाती तुम्हारी कलम\nतब क्या करते क्रांतिकारी जी!\nतब,, तब तो एक ही मार्ग शेष बचता मेरे पास\nमैं क्रांतिपुरुष\nसभी क्रांतियों की मां यानी प्रेम की शरण में बैठ\nबन जाता तुम्हारे जैसी किसी पागल लड़की का प्रेमी\nतथा प्रेम को पृथ्वी का एकमात्र धर्म, एकमात्र जाति,\nएकमात्र वर्ग घोषित करने के पक्ष में छेड़ देता क्रान्ति...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}