{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ve Sab Meri Hi Jaati Se Thin | Rupam Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/c4f7e390\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":279,"description":"वे सब मेरी ही जाति से थीं | रूपम मिश्र \n\nमुझे तुम ने समझाओ अपनी जाति को चीन्हना श्रीमान\nबात हमारी है हमें भी कहने दो\nये जो कूद-कूद कर अपनी सहुलियत से मर्दवाद का बहकाऊ नारा लगाते हो\nउसे अपने पास ही रखो तुम\nबात सत्ता की करो\nजिसने अपने गर्वीले और कटहे पैर से हमेशा मनुष्यता को कुचला है\nजिसकी जरासन्धी भुजा कभी कटती भी है तो फिर से जुड़ जाती है\nरामचरितमानस में शबरी-केवट-प्रसंग सुनती आजी सुबक उठतीं और\nघुरहू चमार के डेहरी छूने पर तड़क कर सात पुश्तों को गाली देतीं\nकोख और वीर्य की कोई जाति नहीं होती यह वे भी जानती थीं\nजो पति की मोटरसाइकिल पर दौड़ती रहीं जौनपुर से बनारस तक\nगर्भ में आई बेटी को मारने के लिए\nजो घर के किसी मांगलिक कार्य में बैठने से इनकार कर देती हैं\nबिना सोने का बड़का हार पहने, सब मेरी ही जाति से हैं\nचकबन्दी के समय एक निरीह स्त्री का खित्ता हड़पने के लिए\nजिसने अपनी बेटियों को कानूनगो के साथ सुलाया\nजो रात भर बच्चे की दवाई की शीशी से बने\nदीये के साथ साँकल चढ़ाए जलती रही\nऔर थूकती रही इस लभजोर समाज पर\nवह भी मेरी ही जाति से थी\n\nजानते तो अप भी बहुत कुछ नहीं हैं महाराज!\nहरवाह बुधई का लड़का जिसे हल का फार लगा\nतो खौलता हुआ कडु  का तेल डाल दिया गया\nउसका चीख कर बेहोश होना ज़मींदार के बेटों का मनोरंजन बना\nबुधई का लड़का अब बड़ा हो गया है\nऔर उसी परिवार के प्रधान बेटे की राइफल लेकर\nभइया ज़िंदाबाद के नारे लगाता है\nतो हाँफता समाजवाद वहीं सिर पकड़कर बैठ जाता है\nमेरी लड़खड़ाती आवाज़ पर आप हँस सकते हैं\nक्योंकि मेरी आत्मा की तलछट में कुछ आवाज़ें बची रह गई हैं\nजो एक बच्ची से कहती थी कि तुम्हें किसी सखी-भौजाई ने बताया नहीं\nकि रात में होंठों को दाँतों  से दबाकर\nचीख कैसे रोकी जाती है जिससे कमरे से बाहर आवाज़ न जाए\nहम जब ठोस मुद्दे को दर्ज करना चाहते हैं तो उसे भ्रमित करने के लिए सिर से\nपैर तक सुविधा और विलास में लिथड़े जन जब कुलीनता का ताना देकर व्यर्थ की\nबहस शुरू करते हैं तो मैं भी चीन्ह जाती हूँ विमर्श हड़पने की नीति\nमुझे आपकी पहचानने की कला पर सविनय खेद है श्रीमान\nक्योंकि एक आदमीपने को छोड़ आपने हर पन पहचान लिया\nजो घृणा के विलास से मन को अछल-विछल करता है\nरोम जला भर जानना काफ़ी कैसे हो सकता है\nजब रमईपुरा और कुँजड़ान कैसे जले आप नहीं जानते\nजहाँ समूची आदमीयत\nसिर्फ़ घृणा-रसूख-नस्ल और जाति...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}