{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Kuch Bann Jaate Hain | Uday Prakash","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/c6844665\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":160,"description":"कुछ बन जाते हैं | उदय प्रकाश\n\nकुछ बन जाते हैं\nतुम मिसरी की डली बन जाओ \nमैं दूध बन जाता हूँ \nतुम मुझमें \nघुल जाओ।\nतुम ढाई साल की बच्ची बन जाओ\nमैं मिसरी घुला दूध हूँ मीठा\nमुझे एक साँस में पी जाओ।\nअब मैं मैदान हूँ \nतुम्हारे सामने दूर तक फैला हुआ। \nमुझमें दौड़ो। मैं पहाड़ हूँ। \nमेरे कंधों पर चढ़ो और फिसलो । \nमैं सेमल का पेड़ हूँ \nमुझे ज़ोर-ज़ोर से झकझोरो और \nमेरी रुई को हवा की तमाम परतों में \nबादलों के छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह \nउड़ जाने दो।\nऐसा करता हूँ कि मैं \nअखरोट बन जाता हूँ \nतुम उसे चुरा लो \nऔर किसी कोने में छुपकर उसे तोड़ो।\nगेहूँ का दाना बन जाता हूँ मैं, \nतुम धूप बन जाओ \nमिट्टी-हवा-पानी बनकर \nमुझे उगाओ \nमेरे भीतर के रिक्त कोषों में \nलुका-छिपी खेलो या कोंपल होकर \nमेरी किसी भी गाँठ से \nकहीं से भी तुरत फूट जाओ।\nतुम अँधेरा बन जाओ \nमैं बिल्ली बनकर दबे पाँव \nचलूँगा चोरी-चोरी ।\nक्यों न ऐसा करें \nकि मैं चीनी-मिट्टी का प्याला बन जाता हूँ \nऔर तुम तश्तरी \nऔर हम कहीं से \nगिरकर एक साथ \nटूट जाते हैं सुबह-सुबह ।\nया मैं गुब्बारा बनता हूँ \nनीले रंग का \nतुम उसके भीतर की हवा बनकर \nफैलो और \nबीच आकाश में \nमेरे साथ फूट जाओ।\nया फिर... \nऐसा करते हैं \nकि हम कुछ और बन जाते हैं।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}