{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Maut Ke Farishtey | Abdul Bismillah","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/c72e2705\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":148,"description":"मौत के फ़रिश्ते | अब्दुल बिस्मिल्लाह\n\nअपने एक हाथ में अंगारा\nऔर दूसरे हाथ में ज़हर का गिलास लेकर\n\nजिस रोज़ मैंने\nअपनी ज़िंदगी के साथ\n\nपहली बार मज़ाक़ किया था\nउस रोज़ मैं\n\nदुनिया का सबसे छोटा बच्चा था\nजिसे न दोज़ख़ का पता होता\n\nन ख़ुदकुशी का\nऔर भविष्य जिसके लिए\n\nमाँ के दूध से अधिक नहीं होता\nउसी बच्चे ने मुझे छला\n\nऔर मज़ाक़ के बदले में\nज़िंदगी ने ऐसा तमाचा लगाया\n\nकि गिलास ने मेरे होंठों को कुचल डाला\nऔर अंगारा\n\nउस ख़ूबसूरत पोशाक के भीतर कहीं खो गया\n\nजिसे रो-रो कर मैंने\n\nज़माने से हासिल किया था\nइस तरह एक पूरा का पूरा हादसा\n\nनिहायत सादगी के साथ वजूद में आया\nऔर दुनिया\n\nकिसी भयानक खोह की शक्ल में बदलती चली गई\nमेरा विषैला जिस्म\n\nशोलों से घिरता चला गया\nज़िंदगी\n\nबिगड़े हुए ज़ख़्म की तरह सड़ने लगी\nऔर काँच को तरह चटखता हुआ मैं\n\nएक कोने में उगी हुई दूब को देखता रहा\nजो उस खोह में हरी थी\n\nवह मेरे चड़चड़ाते हुए मांसपिंड में\nताक़त पैदा करती रही\n\nऔर आग हो गई मेरी इकाई में\nयह आस्था\n\nकि मौत के फ़रिश्ते\nसिर्फ़ हारे हुए लोगों से ख़ुश होते हैं\n\nउनसे नहीं\nजो ज़िंदगी को\n\nअसह्म बदबू के बावजूद\nप्यार करते हैं।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}