{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Main Kiski Aurat Hun | Savita Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/c74910d1\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":189,"description":"मैं किसकी औरत हूँ ।  सविता सिंहमैं किसकी औरत हूँकौन है मेरा परमेश्वरकिसके पाँव दबाती हूँकिसका दिया खाती हूँकिसकी मार सहती हूँ...ऐसे ही थे सवाल उसकेबैठी थी जो मेरे सामनेवाली सीट पर रेलगाड़ी मेंमेरे साथ सफ़र करतीउम्र होगी कोई सत्तर-पचहत्तर सालआँखें धँस गई थीं उसकीमांस शरीर से झूल रहा थाचेहरे पर थे दुख के पठारथीं अनेक फटकारों की खाइयाँसोचकर बहुत मैंने कहा उससे‘मैं किसी की औरत नहीं हूँमैं अपनी औरत हूँअपना खाती हूँजब जी चाहता है तब खाती हूँमैं किसी की मार नहीं सहतीऔर मेरा परमेश्वर कोई नहीं'उसकी आँखों में भर आई एक असहज ख़ामोशीआह! कैसे कटेगा इस औरत का जीवन!संशय में पड़ गई वहसमझते हुए सभी कुछमैंने उसकी आँखों को अपने अकेलेपन के गर्व से भरना चाहाफिर हँसकर कहा ‘मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन हैमेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रालेकिन कुछ घटित हुआ जिसे तुम नहीं जानतीं-हम सब जानते हैं अबकि कोई किसी का नहीं होतासब अपने होते हैंअपने आप में लथपथ-अपने होने के हक़ से लक़दक़'यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई हैअभी पार करनी हैं कई और खाइयाँ फटकारों कीदुख के एक दो और समुद्रपठार यातनाओं के अभी और दो चारजब आख़िर आएगी वह औरतजिसे देख तुम और भी विस्मित होओगीभयभीत भी शायदरोओगी उसके जीवन के लिए फिर हो सशंकितकैसे कटेगा इस औरत का जीवन फिर से कहोगी तुमलेकिन वह हँसेगी मेरी ही तरहफिर कहेगी—‘उन्मुक्त हूँ देखो,और यह आसमानसमुद्र यह और उसकी लहरेंहवा यहऔर इसमें बसी प्रकृति की गंध सब मेरी हैंऔर मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूरपूर्णतया अपनी'","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}