{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Raat Yun Kehne Laga Mujhse Gagan Ka Chand | Ramdhari Singh 'Dinkar'","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/c7c59bc2\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":165,"description":"रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद / रामधारी सिंह \"दिनकर\"\n\nरात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,\nआदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!\nउलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,\nऔर फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।\n\nजानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?\nमैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;\nऔर लाखों बार तुझ-से पागलों को भी\nचाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।\n\nआदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;\nआज उठता और कल फिर फूट जाता है;\nकिन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?\nबुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।\n\nमैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,\nदेख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?\nस्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?\nआग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?\n\nमैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,\nआग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,\nऔर उस पर नींव रखती हूँ नये घर की,\nइस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।\n\nमनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी\nकल्पना की जीभ में भी धार होती है,\nवाण ही होते विचारों के नहीं केवल,\nस्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।\n\nस्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,\n\"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,\nरोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,\nस्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।\"","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}