{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Gaveshna | Aakash","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/c935f41e\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":151,"description":"गवेषणा | आकाश \nइस नुमाइश मे ईश्वर खोज रहा हूँ,\nबच्चों की मानिंद बौराया हुआ,\nइस दुकान से उस दुकान,\nउथली रौशनी की परिधि के भीतर,\nचमकीली भीड़ में घिरे,\nजहाँ केवल नीरसता और बीरानगी विद्यमान है।\nइस नुमाइश में,\nमैं अस्पष्ट अज्ञात लय में चलता हूँ, \nऔर घूमकर पाता हूँ\nस्वयं को निहत्था, निराश और पराजित।\nछान आया हूँ आस्था की चार दीवारी,\nलाँघ लिए हैं प्रकाश के पर्वत,\nघूम लिया है ज्ञान की गुफ़ाओं में,\nकर ली है परिक्रमा बोध के वृक्षों की,\nऔर ढूँढ लिया है किताबों-कलाकृतियों में \nयहाँ तक अनका की पीठ पर बैठ,\nसातवें आसमान से किया है दृष्टिपात धरा का।\nकिन्तु इस नुमाइश में,\nब्रहम किसी ओट में लुका हुआ है,\nगोचर-अगोचर, जीवन-मृत्यू की सीमा से अत्यंत दूर।\nयदा-कदा मैं सोचता हूँ, \nकि इस नुमाइश में क्या होगा मृत्यूपरांत मेरा?\nतब विचार करने पर मैं पाता हूँ,\nमैं यहीं इन शब्दों में जीवित रहूँगा\nअपनी रचनाओं के भीतर साँस लेता रहूँगा\nठीक उसी तरह जैसे,\nसाँस लेता है ईश्वर मेरे भीतर।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}