{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Kate Haath | Ashok Chakradhar","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/cb014642\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":440,"description":"कटे हाथ | अशोक चक्रधर \nबगल में एक पोटली दबाए\nएक सिपाही थाने में घुसा\nऔर सहसा\nथानेदार को सामने पाकर\nसैल्‍यूट मारा\nथानेदार ने पोटली की तरफ निहारा\nसैल्‍यूट के झटके में पोटली भिंच गई\nऔर उसमें से एक गाढी-सी कत्‍थई बूंद रिस गई\nथानेदार ने पूछा:\n'ये पोटली में से क्‍या टपक रहा है ?\nक्‍या कहीं से शरबत की बोतलें\nमारके आ रहा है ?\nसिपाही हडबढाया , हुजूर इसमें शरबत नहीं है\nशरबत नहीं है\nतो घबराया क्‍यों है, हद है\nशरबत नहीं है, तो क्‍या शहद है?\nसिपाही कांपा, शर शहद भी नहीं है\nइसमें से तो\nकुछ और ही चीज बही है\nऔर ही चीज, तो खून है क्‍?\nअबे जल्‍दी बता\nक्‍या किसी मुर्गे की गरदन मरोड़ दी\nक्‍या किसी मेमने की टांग तोड़ दी\nअगर ऐसा है तो बहुत अच्‍छा है\nपकाएंगे\nहम भी खाएंगे, तुझे भी खिलाएंगे!\nसिपाही घिघियाया\nसर! न पका सकता हूं, न खा सकता हूं\nमैं तो बस आपको दिखा सकता हूं\nइतना कहकर सिपाही ने मेज पर पोटली खोली\nदेखते ही, थानेदार की आत्‍मा भी डोली\nपोटली से निकले\nकिसी नौजवान के दो कटे हुए हाथ\nथानेदार ने पूछाए , बता क्‍या है बात\nयह क्‍या कलेस है ?\nसिपाही बोला, हुजूर!\nरेलवे लाइन एक्‍सीडेंट का केस है\nएक्‍सीडेंट का केस है।\nतो यहां क्‍यों लाया है,\nऔर बीस परसेंट बाडी ले आया है।\nएट़टी परसेंट कहां छोड़ आया है।\nसिपाही ने कहा, माई-बाप\nयह बंदा इसलिए तो शर्मिंदा है\nक्‍योंकि एट्टी परसेंट बाडी तो जिंदा है\nपूरी लाश होती तो यहां क्‍यों लाता\nवहीं उसका पंचनामा न बनाता\nलेकिन गजब बहुत बड़ा हो गया\nवह तो हाथ कटवा के खड़ा हो गया\nरेल गुजर गई तो मैं दौडा\nवह तो तना था मानिंदे हथौडा\nमुझे देखकर मुसकराने लगा\nऔर अपनी ठूंठ बाहों को\nहिला-हिलाकर बताने लगा\nले जा, ले जा\nये फालतू हैं, बेकार हैं\nऔर बुलरा ले कहां पत्रकार हैं ?\nमैं उन्‍हें बताऊंगा कि काट दिए\nइसलिए कि\nमैंने झेला है भूख और गरीबी का\nएक लंबा सिलसिला\nपंद्रह वर्ष हो गए\nइन हाथों को कोई काम ही नहीं मिला\nहां, इसलिए-इसलिए\nमैंने सोचा कि फालतू हैं\nइन्‍हें काट दूं\nऔर इस सोए हुए जनतंत्र के\nआलसी पत्रकारों को\nलिखने के लिए प्‍लाट दूं\nप्‍लाट दूं कि इन कटे हाथों को\nपंद्रह साल से\nरोजी-रोटी की तलाश है\nआदमी जिंदा है और\nये उसकी तलाश की लाश है।\nइसे उठा ले\nअरे, इन दोनों हाथों को उठा ले\nकटवा के भी मैं तो जिंदा हूं\nतू क्‍यो मर गया ?\nहुजूर, इतना सुनकर मैं तो डर गया\nजिन्‍न है या भूत\nमैने किसी तरह...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}